सूरह 95

अत्-तीन्

मक्की · 8 आयतें · 2 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह परमेश्वर के जिस प्रतिफल (मजाज़ात) के नियम को प्रमाणित करती है, दूसरी सूरह में उसी के संदर्भ में क़ुरैश क़बीले के प्रमुख नेता को यह चेतावनी दी गई है कि यदि उसने अपनी शरारतें नहीं रोकीं, तो वह अनिवार्यतः इस नियम की चपेट में आ जाएगा। दोनों में ऊपर से संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से प्रतीत होता है, लेकिन यदि गहराई से विचार किया जाए तो संबोधन की दिशा क़ुरैश के उन्हीं नेताओं की ओर है, जिनका विद्रोह अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये भी मक्का में, मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) से कुछ समय पूर्व, पैग़ंबर मुहम्मद (स) के धर्मप्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में अवतरित हुई हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩

पहली सूरह — अत्-तीन — का विषय प्रतिफल के दिन (रोज़-ए-जज़ा) को प्रमाणित करना और उसके संदर्भ में क़ुरैश को यह चेतावनी देना है कि उनके विरुद्ध परमेश्वर का निर्णायक तर्क (हुज्जत) हर दृष्टि से पूर्ण हो चुकी है। अतः अब क़यामत को झूठा कहने के लिए उनके पास हठधर्मिता और ज़िद के अतिरिक्त कुछ भी बाक़ी नहीं है।

दूसरी सूरह — अल्-अलक़ — का विषय क़ुरैश के प्रमुख नेता को यह चेतावनी देना है कि क़ुरआन जैसे दिव्य ग्रंथ के माध्यम से शिक्षा और उपदेश किए जाने के बाद भी यदि वह अपनी उद्दंडता पर अड़ा रहता है, तो उसे इसके परिणामों को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए। परमेश्वर के प्रहरी शीघ्र ही उसे घसीटकर नरक की गहरी खाई में डाल देंगे और उसके समर्थकों में से कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सकेगा।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

بِّسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلتِّينِ وَٱلزَّيْتُونِ ﴿1﴾ وَطُورِ سِينِينَ ﴿2﴾ وَهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ٱلْأَمِينِ ﴿3﴾ لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ فِىٓ أَحْسَنِ تَقْوِيمٍ ﴿4﴾ ثُمَّ رَدَدْنَـٰهُ أَسْفَلَ سَـٰفِلِينَ ﴿5﴾ إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَلَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ ﴿6﴾

तीन और ज़ैतून के पर्वत साक्षी हैं और तूर-ए-सीनीन और तुम्हारा यह सुरक्षित नगर भी कि मनुष्य को हमने (इन स्थानों पर) पैदा किया तो उस समय वह सबसे उत्तम बनावट पर था। फिर हमने उसे गिरावट में डाल दिया,जबकि वह स्वयं पतित होने वाला हुआ। रहे वे जो ईमान पर जमे रहे और उन्होंने भले कर्म किए तो उनके लिए ऐसा अच्छा फल है जो कभी समाप्त नहीं होगा।

فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعْدُ بِٱلدِّينِ ﴿7﴾ أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَحْكَمِ ٱلْحَـٰكِمِينَ ﴿8﴾

तो, (हे पैग़ंबर), इसके बाद क्या चीज़ है जो प्रतिफल के दिन के विषय में तुम्हें झूठा सिद्ध करती है? (इनसे पूछो), क्या परमेश्वर सब निर्णय करने वालों से अच्छा निर्णय करने वाला नहीं है?