सूरह 93

अज़्-ज़ुहा

मक्की · 11 आयतें · 2 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। इनमें संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से है। क़ुरआन के भीतरी क्रम में इनका स्थान यह दर्शाता है कि मक्का में उनके धर्मप्रचार का सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) वाला चरण इन्हीं दो सूरतों पर समाप्त हुआ है। यही बात इनकी विषय-वस्तु से भी स्पष्ट होती है।

दोनों सूरतों का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के लिए तसल्ली और भविष्य में एक महान सफलता की शुभ सूचना देना (बशारत) है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلضُّحَىٰ ﴿1﴾ وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ ﴿2﴾ مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ ﴿3﴾ وَلَلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ ﴿4﴾ وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ ﴿5﴾

दिन साक्षी है, जब वह प्रकाशित हो; और रात भी, जब वह शांत हो जाए कि (मनुष्य की शिक्षा तथा संस्कार के लिए भी दुख और सुख, दोनों चाहिएं, इसलिए) तुम्हारे प्रभु ने तुम्हें न छोड़ा है, न वह तुमसे अप्रसन्न हुआ है। आने वाले दिन तुम्हारे लिए पहले दिनों से कहीं अच्छे होंगे, (हे पैग़ंबर), और तुम्हारा प्रभु शीघ्र ही तुम्हें इतना देगा कि अति प्रसन्न हो जाओगे।

أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَـَٔاوَىٰ ﴿6﴾ وَوَجَدَكَ ضَآلًّا فَهَدَىٰ ﴿7﴾ وَوَجَدَكَ عَآئِلًا فَأَغْنَىٰ ﴿8﴾ فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ ﴿9﴾ وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ ﴿10﴾ وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ ﴿11﴾

क्या यह सत्य नहीं है कि उसने तुम्हें अनाथ देखा तो ठिकाना दिया? मार्ग ढूंढते देखा तो मार्गदर्शन किया? और ज़रूरतमन्द देखा तो (मन का ऐसा संतोष प्रदान किया कि) समृद्ध कर दिया। इसलिए अब अनाथ हो तो उसे दबाओ नहीं, और पूछने वाला हो तो उसे झिड़को नहीं, और मार्गदर्शन का जो वरदान तुम्हारे परमेश्वर ने तुम्हें दिया है, उसकी चर्चा करते रहो।