सूरह 91

अश्-शम्स्

मक्की · 15 आयतें · 2 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में परलोक (आख़िरत) में घाटे (ख़ुसरान) और उसमें सफलता एवं कल्याण (फौज़-व-फ़लाह) के जिस मार्ग का उल्लेख संक्षेप में किया गया है, दूसरी सूरह में उसकी विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई है। दोनों में संबोधन क़ुरैश क़बीले के नेताओं से है, लेकिन शैली में उपेक्षा (इअराज़) का पहलू स्पष्ट रूप से झलकता है। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।

पहली सूरह — अश्-शम्स — का विषय प्रतिफल के नियम (क़ानून-ए-जज़ा-व-सज़ा) के संदर्भ में क़ुरैश के नेताओं को उनकी उद्दंडता और विद्रोही आचरण पर चेतावनी देना है, जो वे सत्य के आह्वान (दावत-ए-हक़) के विरुद्ध अपनाए हुए थे।

दूसरी सूरह — अल्-लैल — का विषय क़ुरैश के लिए उस मार्ग की व्याख्या करना है, जिसका उल्लेख सूरह शम्स में इन शब्दों में हुआ है: 'क़द अफ़्लह मन ज़क़ाहा व क़द ख़ाब मन दस्साहा' (सफलता पा गया वह जिसने अंतःकरण को शुद्ध किया और असफल हुआ वह जिसने उसे दूषित कर डाला)।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلشَّمْسِ وَضُحَىٰهَا ﴿1﴾ وَٱلْقَمَرِ إِذَا تَلَىٰهَا ﴿2﴾ وَٱلنَّهَارِ إِذَا جَلَّىٰهَا ﴿3﴾ وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰهَا ﴿4﴾ وَٱلسَّمَآءِ وَمَا بَنَىٰهَا ﴿5﴾ وَٱلْأَرْضِ وَمَا طَحَىٰهَا ﴿6﴾ وَنَفْسٍ وَمَا سَوَّىٰهَا ﴿7﴾ فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَىٰهَا ﴿8﴾ قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّىٰهَا ﴿9﴾ وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّىٰهَا ﴿10﴾

सूरज साक्षी है और उसका चढ़ना; और चाँद जब उसके पीछे आए; और दिन जब उसको प्रकाशित करे; और रात जब उसको ढ़क ले; और आकाश और जैसा उसे बनाया; और धरती और जैसा उसे बिछाया; और मानव अंतःकरण और जैसा उसे संवारा, फिर उसकी भलाई और बुराई उसे सुझा दी कि क़यामत का दिन अटल है। (इसलिए) सफलता पा गया वह जिसने अंतःकरण को शुद्ध किया और असफल हुआ वह जिसने उसे दूषित कर डाला।

كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوَىٰهَآ ﴿11﴾ إِذِ ٱنۢبَعَثَ أَشْقَىٰهَا ﴿12﴾ فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ ٱللَّهِ نَاقَةَ ٱللَّهِ وَسُقْيَـٰهَا ﴿13﴾ فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُم بِذَنۢبِهِمْ فَسَوَّىٰهَا ﴿14﴾ وَلَا يَخَافُ عُقْبَـٰهَا ﴿15﴾

समूद ने अपनी अवज्ञा के कारण इसे झूठा कह दिया, जब उनका सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली उठकर खड़ा हुआ तो परमेश्वर के रसूल ने उन्हें सचेत किया कि परमेश्वर की इस ऊँटनी और इसके पीने की बारी से सावधान रहो। परंतु उन्होंने उसे झूठा कह दिया और ऊँटनी के पुट्ठों की नसें काट दीं। तो उनके इस पाप के परिणामस्वरूप उनके प्रभु ने उनपर ऐसी विपत्ति डाल दी कि सबको बराबर कर दिया। और उसे कोई भय नहीं था कि इसके पश्चात क्या होगा।1

टिप्पणियाँ 1
  1. ये शब्द ऊंटनी की हत्या का अर्थ देते हैं, इसलिए कि पट्ठों की नसें काट दी जाएँ तो ऊंट अवश्य मर जाता है। ↩