सूरह 89

अल्-फ़ज्र

मक्की · 30 आयतें · 5 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों में संबोधन क़ुरैश क़बीले के नेताओं से है, लेकिन शैली में उपेक्षा (इअराज़) का पहलू प्रमुख है। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।

दोनों सूरतों का विषय क़ुरैश के नेताओं को उनकी उद्दंडता और विद्रोही आचरण पर चेतावनी देना है, जो परमेश्वर की अनुकंपाएँ पाने के बाद परमेश्वर और उसके भक्तों के साथ वे अपनाए हुए थे।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلْفَجْرِ ﴿1﴾ وَلَيَالٍ عَشْرٍ ﴿2﴾ وَٱلشَّفْعِ وَٱلْوَتْرِ ﴿3﴾ وَٱلَّيْلِ إِذَا يَسْرِ ﴿4﴾ هَلْ فِى ذَٰلِكَ قَسَمٌ لِّذِى حِجْرٍ ﴿5﴾

उषाकाल साक्षी है, और चाँद की हर दस रातें, और सम और विषम महीना, और रात भी जब वह विदा होती है कि क़यामत की सुबह होनी है। इसमें किसी बुद्धिजीवी के लिए क्या है कोई बड़ी गवाही?

أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ ﴿6﴾ إِرَمَ ذَاتِ ٱلْعِمَادِ ﴿7﴾ ٱلَّتِى لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِى ٱلْبِلَـٰدِ ﴿8﴾ وَثَمُودَ ٱلَّذِينَ جَابُوا۟ ٱلصَّخْرَ بِٱلْوَادِ ﴿9﴾ وَفِرْعَوْنَ ذِى ٱلْأَوْتَادِ ﴿10﴾ ٱلَّذِينَ طَغَوْا۟ فِى ٱلْبِلَـٰدِ ﴿11﴾ فَأَكْثَرُوا۟ فِيهَا ٱلْفَسَادَ ﴿12﴾ فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ ﴿13﴾ إِنَّ رَبَّكَ لَبِٱلْمِرْصَادِ ﴿14﴾

तूने देखा नहीं कि तेरे प्रभु ने आद के साथ क्या किया? वही स्तंभों वाले इरम जिनके समान दुनिया के देशों में कोई क़ौम पैदा नहीं की गई। और समूद के साथ जिन्होंने क़ुरा की घाटी में पत्थर तराशे। और कीलों वाले फ़िरऔन के साथ। ये वे लोग थे जिन्होंने दुनिया के देशों में सर उठाया और उनमें बड़ा ऊधम मचाया तो तेरे प्रभु ने उनपर दण्ड का कोडा बरसा दिया। सत्य यह है कि इस प्रकार के सर उठाने वालों के लिए तेरा प्रभु घात लगाए रहा है।

فَأَمَّا ٱلْإِنسَـٰنُ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكْرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَكْرَمَنِ ﴿15﴾ وَأَمَّآ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَهَـٰنَنِ ﴿16﴾ كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ ٱلْيَتِيمَ ﴿17﴾ وَلَا تَحَـٰٓضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ ﴿18﴾ وَتَأْكُلُونَ ٱلتُّرَاثَ أَكْلًا لَّمًّا ﴿19﴾ وَتُحِبُّونَ ٱلْمَالَ حُبًّا جَمًّا ﴿20﴾

परंतु मनुष्य की हालत यह है कि उसका प्रभु जब उसे परखता है और इसके लिए उसको सम्मानित करता और उपकार प्रदान करता है तो कहता है कि मेरे प्रभु ने मेरी शान बढ़ाई है। और जब उसे परखता है और इसके लिए उसकी जीविका उस पर तंग करता है तो कहता है कि मेरे प्रभु ने मुझे अपमानित कर डाला। नहीं, यह इसलिए नहीं होता, कदापि नहीं, अपितु तुम्हें परखने के लिए होता है और तुम्हारी दशा यह है कि तुम अनाथ का आदर नहीं करते और ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए एक दूसरे को नहीं उभारते और विरासत को समेट कर खा जाते हो और धन के प्रेम में मतवाले हुए रहते हो।

كَلَّآ إِذَا دُكَّتِ ٱلْأَرْضُ دَكًّا دَكًّا ﴿21﴾ وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا ﴿22﴾ وَجِا۟ىٓءَ يَوْمَئِذٍۭ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكْرَىٰ ﴿23﴾ يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى ﴿24﴾ فَيَوْمَئِذٍ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌ ﴿25﴾ وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌ ﴿26﴾

(मनुष्य समझता है कि वह यूं ही छोड़ दिया जाएगा)? कदापि नहीं, जब धरती को कूट-कूट कर समतल कर दिया जाएगा, और तेरा प्रभु प्रकट होगा, इस प्रकार कि फ़रिश्ते पंक्तियों में खड़े होंगे और नरक को उस दिन पास ले आया जाएगा, उस दिन मनुष्य समझेगा। पर उसके इस समझने से क्या लाभ! वह कहेगा: काश, मैंने अपने इस जीवन के लिए कुछ किया होता! फिर उस दिन जो दण्ड वह प्रभु देगा, वैसा दण्ड देने वाला कोई नहीं और जिस प्रकार बांधेगा, उस प्रकार बांधने वाला कोई नहीं।

يَـٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ ﴿27﴾ ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةً مَّرْضِيَّةً ﴿28﴾ فَٱدْخُلِى فِى عِبَـٰدِى ﴿29﴾ وَٱدْخُلِى جَنَّتِى ﴿30﴾

(दूसरी ओर) वह कहेगा: हे संतुष्ट मन, अपने प्रभु की ओर लौट, इस दशा में कि तू उससे प्रसन्न है और वह तुझसे प्रसन्न। तो मेरे भक्तों में मिल जा और मेरे स्वर्ग में प्रवेश कर।