सूरह 85

अल्-बुरूज्

मक्की · 22 आयतें · 5 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में तर्क का आधार ब्रह्मांड (आफ़ाक़) के चिन्हों व प्रमाणों तथा इतिहास के अखंडनीय तथ्यों पर है, जबकि दूसरी सूरह में ब्रह्मांड संबंधी प्रमाणों के साथ-साथ मनुष्य की बनावट में परमेश्वर के सामर्थ्य व प्रज्ञा के चिन्हों को भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश क़बीले के नेताओं की ओर है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।

दोनों सूरतों का विषय क़यामत से संबन्धित क़ुरैश की शंकाओं का खंडन करना और उन्हें यह चेतावनी देना है कि इस्लाम के मानने वालों पर उनका अत्याचार और रसूल के विरुद्ध उनके षड्यंत्र अब अपने अंजाम तक पहुँचने को हैं। अवकाश दे कर जो जाल उनके लिए बिछाया गया है, उससे वे बच नहीं सकेंगे। उनका समय अब निकट आ चुका है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْبُرُوجِ ﴿1﴾ وَٱلْيَوْمِ ٱلْمَوْعُودِ ﴿2﴾ وَشَاهِدٍ وَمَشْهُودٍ ﴿3﴾ قُتِلَ أَصْحَـٰبُ ٱلْأُخْدُودِ ﴿4﴾ ٱلنَّارِ ذَاتِ ٱلْوَقُودِ ﴿5﴾ إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌ ﴿6﴾ وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌ ﴿7﴾

दुर्गों वाला आकाश साक्षी है और वह दिन भी जिसका वचन (तुम्हें) दिया जा रहा है; और (दुनिया में) हर देखने वाला, (यदि वह सीखने वाली आँख से देखे) और जो कुछ वह देख रहा है, यह सब साक्षी है कि क़यामत हो कर रहेगी। (इसलिए) मारे गए ईंधन भरी आग की घाटी वाले, जब वे (नरक में) उस पर बैठ गए और जो कुछ वे (दुनिया में) मानने वालों के साथ करते रहे, उसका परिणाम देख रहे हैं।

وَمَا نَقَمُوا۟ مِنْهُمْ إِلَّآ أَن يُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ ﴿8﴾ ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ شَهِيدٌ ﴿9﴾

ये केवल इसलिए इनके शत्रु हो गए कि उन्होंने परमेश्वर को मान लिया, वह प्रबल, अपने आप में प्रशंसित, वही जो धरती और समस्त आकाशों के साम्राज्य का स्वामी है। और सत्य यह है कि परमेश्वर हर चीज़ को देख रहा है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ فَتَنُوا۟ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا۟ فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ ٱلْحَرِيقِ ﴿10﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ جَنَّـٰتٌ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْكَبِيرُ ﴿11﴾

जिन लोगों ने मोमिन पुरुषों और स्त्रियों को सताया और फिर प्रायश्चित नहीं किया, उनके लिए नरक का दण्ड है और उनके लिए जलने की यातना है। इसके विपरीत जो अपने ईमान पर जमे रहे और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके लिए स्वर्ग के बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। यही वास्तव में बड़ी सफलता है।

إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ ﴿12﴾ إِنَّهُۥ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ ﴿13﴾ وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلْوَدُودُ ﴿14﴾ ذُو ٱلْعَرْشِ ٱلْمَجِيدُ ﴿15﴾ فَعَّالٌ لِّمَا يُرِيدُ ﴿16﴾

तेरे प्रभु की पकड़ निस्संदेह बड़ी कठोर है, (ये किसी भ्रम में न रहें)। कोई संदेह नहीं कि वही उत्पत्ति करता है और वही लौटाएगा। वह क्षमा करने वाला है, यदि ये पलटें। बड़ा प्रेम करने वाला, सिंहासन का स्वामी, ऊँचा, जो चाहे कर डालने वाला है।

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْجُنُودِ ﴿17﴾ فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ ﴿18﴾ بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى تَكْذِيبٍ ﴿19﴾ وَٱللَّهُ مِن وَرَآئِهِم مُّحِيطٌۢ ﴿20﴾ بَلْ هُوَ قُرْءَانٌ مَّجِيدٌ ﴿21﴾ فِى لَوْحٍ مَّحْفُوظٍۭ ﴿22﴾

तुझे उन सेनाओं की सूचना पहुंची है (जो इसी प्रकार उद्दंड हो गए थे)? फ़िरऔन और समूद की सेनाओं की? (फिर क्या यह कोई नकारने की चीज़ है)? कदापि नहीं, अपितु इन नकारने वालों ने निर्णय कर लिया है कि ये नकारने में लगे रहेंगे और सत्य यह है कि परमेश्वर इन्हें आगे और पीछे से घेरे हुए है। नहीं, यह कोई नकारने की चीज़ नहीं है, अपितु यह गौरवशाली क़ुरआन है। (हर शैतान की घुसपैठ से परे), यह लौह-ए-महफ़ूज में है।