सूरह 83

अल्-मुतफ़्फ़िफ़ीन्

मक्की · 36 आयतें · 4 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में मनुष्य की प्रकृति में निहित भलाई और बुराई के बोध (शऊर) से तर्क प्रस्तुत किया गया है, जबकि दूसरी सूरह में ब्रह्मांड (आफ़ाक़) के चिन्हों और प्रमाणों से। दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश क़बीले के नेताओं की ओर है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।

दोनों सूरतों का विषय क़ुरैश को यह चेतावनी देना है कि क़यामत के बारे में वे किसी भ्रम में न रहें। कुछ भी हो, उन्हें अपने प्रभु के समक्ष उपस्थित होना है और अपने कर्मों के अनुसार अनिवार्य रूप से अलग-अलग अंजाम को पहुँचना है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَيْلٌ لِّلْمُطَفِّفِينَ ﴿1﴾ ٱلَّذِينَ إِذَا ٱكْتَالُوا۟ عَلَى ٱلنَّاسِ يَسْتَوْفُونَ ﴿2﴾ وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ ﴿3﴾ أَلَا يَظُنُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ ﴿4﴾ لِيَوْمٍ عَظِيمٍ ﴿5﴾ يَوْمَ يَقُومُ ٱلنَّاسُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿6﴾

बर्बादी है डंडी मारने वालों के लिए, ये जो लोगों से लेते हैं तो पूरा लेते हैं और जब उनके लिए नापते या तोलते हैं तो उसमें डंडी मारते हैं। क्या ये नहीं समझते कि एक दिन अवश्य उठाए जाएँगे? एक बड़े दिन की उपस्थिति के लिए। उस दिन जब लोग जगत प्रभु के सामने प्रस्तुत होने के लिए उठेंगे।

كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْفُجَّارِ لَفِى سِجِّينٍ ﴿7﴾ وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سِجِّينٌ ﴿8﴾ كِتَـٰبٌ مَّرْقُومٌ ﴿9﴾ وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴿10﴾ ٱلَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ ﴿11﴾ وَمَا يُكَذِّبُ بِهِۦٓ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ﴿12﴾ إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿13﴾ كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ ﴿14﴾ كَلَّآ إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَّمَحْجُوبُونَ ﴿15﴾ ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُوا۟ ٱلْجَحِيمِ ﴿16﴾ ثُمَّ يُقَالُ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ ﴿17﴾

(कहते हैं कि उस दिन अंत में सब बराबर होंगे)। कदापि नहीं, अवज्ञाकारियों के कर्मों का खाता निस्संदेह "सिज्जीन" में होगा। और तुम क्या समझे कि "सिज्जीन" क्या है? एक खाता है लिखा हुआ। बर्बादी है उस दिन नकारने वालों के लिए। जो प्रतिफल के दिन को झूठा बता रहे हैं। और सत्य यह है किउसको वही झूठा बताता है जो मर्यादा भंग करने वाला, अधिकारों का हनन करने वाला है। उसे जब हमारी आयतें सुनाई जाती हैं तो कहता है कि ये पुराने लोगों की कल्पित कहानियां हैं। कदापि नहीं, अपितु इनके दिलों पर इनके कर्मों का ज़ंग बैठ गया है। (ये समझते हैं कि क़यामत हुई तो वहां भी यही परमेश्वर के निकटस्थ होंगे)। कदापि नहीं, उस दिन तो ये अपने प्रभु से रोक दिए जाएँगे, फिर अवश्य नरक में जा पड़ेंगे, फिर कहा जाएगा: यह वही चीज़ है जिसको तुम झूठा बताते रहे हो।

كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْأَبْرَارِ لَفِى عِلِّيِّينَ ﴿18﴾ وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا عِلِّيُّونَ ﴿19﴾ كِتَـٰبٌ مَّرْقُومٌ ﴿20﴾ يَشْهَدُهُ ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿21﴾ إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍ ﴿22﴾ عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ﴿23﴾ تَعْرِفُ فِى وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ ٱلنَّعِيمِ ﴿24﴾ يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍ مَّخْتُومٍ ﴿25﴾ خِتَـٰمُهُۥ مِسْكٌ ۚ وَفِى ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ ٱلْمُتَنَـٰفِسُونَ ﴿26﴾ وَمِزَاجُهُۥ مِن تَسْنِيمٍ ﴿27﴾ عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿28﴾

(नहीं, अच्छे और बुरे कभी समान नहीं हो सकते)। कदापि नहीं, आज्ञाकारियों के कर्मों का खाता "इल्लिय्यीन" में होगा। और तुम क्या समझे "इल्लिय्यीन" क्या है? एक खाता है लिखा हुआ, महान फ़रिश्तों के निरीक्षण में। निस्संदेह, ये आज्ञाकारी (वहाँ) उपहारों में घिरे होंगे, गद्दियों पर विराजमान तमाशा देखते। इनके इस ऐश की रौनक तुम इनके चेहरों पर देखोगे। इन्हें मुहरबंद निर्मल सुरा पिलाई जाएगी, जिस पर कस्तूरी की मुहर लगी होगी। यह चीज़ है जिसकी चाहत में चाहने वालों को एक दूसरे से आगे बढ्ने के लिए तत्पर होना चाहिए — और उसमें तस्नीम का मिश्रण होगा, एक विशेष झरना जिसके किनारे बैठकर परमेश्वर के ये समीपवर्ती भक्त पिएंगे।

إِنَّ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ كَانُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يَضْحَكُونَ ﴿29﴾ وَإِذَا مَرُّوا۟ بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ ﴿30﴾ وَإِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمُ ٱنقَلَبُوا۟ فَكِهِينَ ﴿31﴾ وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ لَضَآلُّونَ ﴿32﴾ وَمَآ أُرْسِلُوا۟ عَلَيْهِمْ حَـٰفِظِينَ ﴿33﴾ فَٱلْيَوْمَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنَ ٱلْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ ﴿34﴾ عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ﴿35﴾ هَلْ ثُوِّبَ ٱلْكُفَّارُ مَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿36﴾

(वह भी दिन थे कि) ये अपराधी मानने वालों पर हंसते थे, जब उनके के पास से निकलते तो आंखों से इशारे करते थे, जब अपने लोगों में पलटते तो मज़े लेते हुए पलटते थे, और जब उनको देखते तो कहते थे कि निस्संदेह, ये बहके हुए लोग हैं। ये सुधार करने के दावेदार बन कर उठे हैं, यद्यपि ये उनपर कोई निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गए। परंतु आज मानने वाले इन नकारने वालों पर हंस रहे हैं, गद्दी ऊपर बैठे इनका अंत देखते हुए — क्यों, पालिया ना इन नकारने वालों ने अपने करतूतों का फल!