सूरह 79

अन्-नाज़िआत्

मक्की · 46 आयतें · 8 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में क़ुरैश के नेतृत्व को उसके जिस व्यवहार पर चेतावनी दी गई है, दूसरी सूरह में उसी पर एक विशेष घटना के परिप्रेक्ष्य में इतना तीव्र प्रकोप है जो सूरह की हर आयत से मानो उबलता हुआ प्रतीत होता है।

यद्यपि दूसरी सूरह में संबोधन ऊपर-ऊपर से पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी हुआ है, परंतु गहराई से विचार किया जाए तो दोनों सूरतों में संबोधन की दिशा स्पष्ट रूप से क़ुरैश के फ़िरऔनी नेताओं की ओर है। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।

पहली सूरह में तर्क ब्रह्मांड (आफ़ाक़) के चिन्हों और उदाहरणों तथा इतिहास के तथ्यों से प्रस्तुत किया गया है।

दूसरी सूरह में ब्रह्मांड-संबंधी तर्कों के साथ-साथ मनुष्य की बनावट में परमेश्वर के सामर्थ्य और प्रज्ञा के चिन्हों को भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

दोनों सूरतों का विषय क़यामत को प्रमाणित करना, उसके संदर्भ में क़ुरैश को चेतावनी और उसके बारे में उनके आचरण पर उन्हें सावधान करना है।

दूसरी सूरह में यह चेतावनी अत्यंत तीव्र प्रकोप का रूप धारण कर लेती है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلنَّـٰزِعَـٰتِ غَرْقًا ﴿1﴾ وَٱلنَّـٰشِطَـٰتِ نَشْطًا ﴿2﴾ وَٱلسَّـٰبِحَـٰتِ سَبْحًا ﴿3﴾ فَٱلسَّـٰبِقَـٰتِ سَبْقًا ﴿4﴾ فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًا ﴿5﴾

हवाएँ साक्षी हैं जड़ से उखाड़ने वाली और वह भी जो बहुत नरमी से चलती हैं। और (आकाश में) तैरते दौड़ते, फिर इस दौड़ में एक दूसरे से बढ़ते, फिर आदेश का निर्वाह करते हुए बादल साक्षी हैं कि जिस चीज़ का वचन तुम्हें दिया जा रहा है, वह होकर रहेगी।

فَٱلسَّـٰبِقَـٰتِ سَبْقًا ﴿4﴾ فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًا ﴿5﴾ يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلرَّاجِفَةُ ﴿6﴾ تَتْبَعُهَا ٱلرَّادِفَةُ ﴿7﴾ قُلُوبٌ يَوْمَئِذٍ وَاجِفَةٌ ﴿8﴾ أَبْصَـٰرُهَا خَـٰشِعَةٌ ﴿9﴾

उस दिन, जब कपकपाहट छूटेगी, एक के पीछे दूसरी; उस दिन कितने दिल (डर से) धड़कते होंगे। उनकी आँखें झुकी होंगी।

يَقُولُونَ أَءِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِى ٱلْحَافِرَةِ ﴿10﴾ أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًا نَّخِرَةً ﴿11﴾ قَالُوا۟ تِلْكَ إِذًا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌ ﴿12﴾

पूछते हैं: क्या (मृत्यु के बाद) हम अवश्य इसी प्रकार पलटाकर वापस लाए जाएँगे? क्या उस समय, जब हम खनखनाती हड्डियां होंगे? कहने लगे कि यह लौटना तो फिर बड़े घाटे का लौटना हुआ!

فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌ وَٰحِدَةٌ ﴿13﴾ فَإِذَا هُم بِٱلسَّاهِرَةِ ﴿14﴾

तो (ये मज़ाक़ उड़ाते हैं तो सुन लें कि) यह केवल एक ही डांट होगी, फिर अचानक ये मैदान में सामने होंगे।

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ ﴿15﴾ إِذْ نَادَىٰهُ رَبُّهُۥ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى ﴿16﴾ ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ ﴿17﴾ فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰٓ أَن تَزَكَّىٰ ﴿18﴾ وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ ﴿19﴾ فَأَرَىٰهُ ٱلْـَٔايَةَ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿20﴾ فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ ﴿21﴾ ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ ﴿22﴾ فَحَشَرَ فَنَادَىٰ ﴿23﴾ فَقَالَ أَنَا۠ رَبُّكُمُ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿24﴾ فَأَخَذَهُ ٱللَّهُ نَكَالَ ٱلْـَٔاخِرَةِ وَٱلْأُولَىٰٓ ﴿25﴾ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةً لِّمَن يَخْشَىٰٓ ﴿26﴾

(अच्छा सुनो), क्या मूसा का वृत्तांत तुम्हें पहुंचा है? जब उसके प्रभु ने तुवा की पवित्र घाटी में उसे पुकारा कि फ़िरऔन के पास जाओ, उसने बहुत सर उठा लिया है और उससे कहो कि क्या तुम में कुछ भावना है कि शुद्धता की ओर आ जाओ और मैं तुमको तुम्हारे प्रभु का मार्ग दिखाऊँ कि तुम उससे डरो? फिर उसने (फ़िरऔन के पास जा कर) उसे बड़ी निशानी दिखाई, परंतु उसने उसे झूठा कह दिया और नहीं माना। फिर अपनी गतिविधियों के लिए पलटा और लोगों को इकट्ठा करके पुकारा, फिर कहा कि तुम्हारा सबसे बड़ा प्रभु तो मैं हूं। अंततः, परमेश्वर ने इस लोक और परलोक, दोनों के दण्ड में उसे पकड़ लिया। (लोगो), इस वृत्तांत में अवश्य बड़ी सीख है उनके लिए जो डरने वाले हों।

ءَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ ٱلسَّمَآءُ ۚ بَنَىٰهَا ﴿27﴾ رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّىٰهَا ﴿28﴾ وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَىٰهَا ﴿29﴾ وَٱلْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَىٰهَآ ﴿30﴾ أَخْرَجَ مِنْهَا مَآءَهَا وَمَرْعَىٰهَا ﴿31﴾ وَٱلْجِبَالَ أَرْسَىٰهَا ﴿32﴾ مَتَـٰعًا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ ﴿33﴾

(तुम नहीं मानते तो बताओ), क्या तुम्हें बनाना कठिन है या आकाश को? परमेश्वर ने उसे बनाया है, उसका गुंबद ऊँचा किया है, फिर उसको अच्छे से ठीक किया है और (उस में छाई हुई) उसकी रात को उसने ढक दिया और उसका दिन बेनक़ाब किया है। इसके बाद धरती को उसने बिछाया है, उसके अंदर से उसका पानी और चारा निकाला है और उसके पर्वत (उसमें) गाड़े हैं। तुम्हारे लिए और तुम्हारे मवेशियों के लिए दुनिया की सामग्री के रूप में।

فَإِذَا جَآءَتِ ٱلطَّآمَّةُ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿34﴾ يَوْمَ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ مَا سَعَىٰ ﴿35﴾ وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ ﴿36﴾ فَأَمَّا مَن طَغَىٰ ﴿37﴾ وَءَاثَرَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا ﴿38﴾ فَإِنَّ ٱلْجَحِيمَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿39﴾ وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ وَنَهَى ٱلنَّفْسَ عَنِ ٱلْهَوَىٰ ﴿40﴾ فَإِنَّ ٱلْجَنَّةَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿41﴾

अतः (सत्य यह है कि) जब वह बड़ा हंगामा घटित होगा तो यह सब उलट-पलट हो जाएगा। उस दिन मनुष्य अपना सब किया धरा याद करेगा और नरक को उनके सामने बेनक़ाब कर दिया जाएगा जो उससे मिलेंगे। तो जिसने अवज्ञा को अपनाया और दुनिया के जीवन को प्राथमिकता दी तो नरक ही उसका ठिकाना होगा और जो अपने प्रभु के सामने प्रस्तुत होने से डरा और अपने जी को चाहतों के पीछे चलने से रोका तो स्वर्ग ही उसका ठिकाना है।

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا ﴿42﴾ فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَىٰهَآ ﴿43﴾ إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَىٰهَآ ﴿44﴾ إِنَّمَآ أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَىٰهَا ﴿45﴾ كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَىٰهَا ﴿46﴾

वे तुमसे पूछते हैं कि आख़िर वह घड़ी कब आकर ठहरेगी? तुम्हें इस विषय से क्या लेना देना? उसका ज्ञान तेरे प्रभु ही के ऊपर है। तुम तो केवल उन लोगों को सचेत कर देने वाले हो जो उस से डरें। ये जिस दिन उसको देखेंगे तो यही समझेंगे कि मानो एक शाम या एक सुबह से अधिक दुनिया में नहीं रहे।