सूरह 67

अल्-मुल्क्

मक्की · 30 आयतें · 13 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में क़यामत और दूसरी में उस दंड से सावधान किया गया है जो रसूल को नकारने के परिणामस्वरूप उसकी कौम पर अनिवार्य रूप से आता है। यद्यपि दोनों में कई जगह संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी है, किंतु संबोधन की दिशा हर स्थान पर क़ुरैश के नेताओं की ओर है। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के इंज़ार (प्रारम्भिक चेतावनी) के चरण में अवतरित हुई हैं।

पहली सूरह — अल्-मुल्क — का विषय क़ुरैश पर यह स्पष्ट करना है कि दुनिया जिस तरह और जिस उद्देश्य के लिए अस्तित्व में आई है, क़यामत उसका एक अनिवार्य परिणाम है। अतः उससे निडर होकर अपने आपको उस अंत तक न पहुँचाओ, जहाँ अपराध को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प और इस स्वीकृति के परिणामों को भोगने के अतिरिक्त कोई मार्ग बाक़ी न रहे। उस प्रभु से डरो जो आज भी, जिस समय और जिस प्रकार चाहे, तुम्हें अपनी पकड़ में ले सकता है।

सूरह में तर्क परमेश्वर की दया, सामर्थ्य और पालन-शक्ति की उन निशानियों से किया गया है जिन्हें मनुष्य हर पल अपने आस पास देखता है।

दूसरी सूरह — अल्-क़लम — का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के द्वारा प्रस्तुत किए गए ग्रंथ और उनके चरित्र से क़ुरैश के नेताओं के चरित्र और उनके झूठे दावों की तुलना करके उन्हें इस वास्तविकता पर सावधान करना है कि परमेश्वर के ग्रंथ और उसके पैग़ंबर के मुक़ाबले में वे विद्रोह और अहंकार का मार्ग न अपनाएँ। उनकी सारी चमक-दमक और उनका सारा गर्व व अभिमान ईश्वरीय दंड के घेरे में है। वे बुद्धि का उपयोग करें, उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। वे केवल इस लिए बातें बना रहे हैं कि उन्हें ढील दी जा रही है। परमेश्वर का निर्णय शीघ्र ही उनके बारे में आ जाएगा।

सूरह के अंत में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को धैर्य के साथ इस निर्णय की प्रतीक्षा करने का आदेश दिया गया है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

تَبَـٰرَكَ ٱلَّذِى بِيَدِهِ ٱلْمُلْكُ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿1﴾ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْمَوْتَ وَٱلْحَيَوٰةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفُورُ ﴿2﴾

अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत यश देने वाला है, वह (प्रभु) जिसके हाथ में (सृष्टि) का शासन है और वह प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है। (वही) जिसने मृत्यु और जीवन को पैदा किया ताकि तुमको परखे कि तुममें से कौन अच्छे कर्म करने वाला है। और वह प्रबल भी है और क्षमा करने वाला भी।

ٱلَّذِى خَلَقَ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍ طِبَاقًا ۖ مَّا تَرَىٰ فِى خَلْقِ ٱلرَّحْمَـٰنِ مِن تَفَـٰوُتٍ ۖ فَٱرْجِعِ ٱلْبَصَرَ هَلْ تَرَىٰ مِن فُطُورٍ ﴿3﴾ ثُمَّ ٱرْجِعِ ٱلْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنقَلِبْ إِلَيْكَ ٱلْبَصَرُ خَاسِئًا وَهُوَ حَسِيرٌ ﴿4﴾

(वही) जिसने सात आकाश बनाए, अनेक परतों में। परम दयालु परमेश्वर की रचना में तुम कोई दोष नहीं पाओगे। फिर पलट कर देखो, क्या कोई कमी कहीं पाते हो? फिर बार-बार देखो, तुम्हारी दृष्टि थक-हार कर तुम्हारे पास असफल लौट आएगी।

وَلَقَدْ زَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِمَصَـٰبِيحَ وَجَعَلْنَـٰهَا رُجُومًا لِّلشَّيَـٰطِينِ ۖ وَأَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ ٱلسَّعِيرِ ﴿5﴾ وَلِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ ﴿6﴾

(तुम नहीं देखते कि) सबसे निचले आकाश को हमने दीपों से सुशोभित किया है और इन्हीं दीपों को शैतानों के लिए हमने गोलाबारी का माध्यम बना दिया है, और उनके लिए दहकती हुई आग का दण्ड भी हमने तैयार कर रखा है। जिन लोगों ने अपने प्रभु का कुफ़्र किया है, उनके लिए (इसी प्रकार) नरक का दण्ड है, और वह कैसा बुरा ठिकाना है!

إِذَآ أُلْقُوا۟ فِيهَا سَمِعُوا۟ لَهَا شَهِيقًا وَهِىَ تَفُورُ ﴿7﴾ تَكَادُ تَمَيَّزُ مِنَ ٱلْغَيْظِ ۖ كُلَّمَآ أُلْقِىَ فِيهَا فَوْجٌ سَأَلَهُمْ خَزَنَتُهَآ أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَذِيرٌ ﴿8﴾ قَالُوا۟ بَلَىٰ قَدْ جَآءَنَا نَذِيرٌ فَكَذَّبْنَا وَقُلْنَا مَا نَزَّلَ ٱللَّهُ مِن شَىْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍ كَبِيرٍ ﴿9﴾ وَقَالُوا۟ لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ أَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِىٓ أَصْحَـٰبِ ٱلسَّعِيرِ ﴿10﴾ فَٱعْتَرَفُوا۟ بِذَنۢبِهِمْ فَسُحْقًا لِّأَصْحَـٰبِ ٱلسَّعِيرِ ﴿11﴾

ये जब उसमें डाले जाएँगे तो उसका दहाड़ना सुनेंगे और वह उबल रहा होगा। लगेगा कि क्रोध से फटा पड़ रहा है। हर बार जब कोई भीड़ उसमें डाली जाएगी तो उसके निरीक्षक उनसे पूछेंगे: क्या तुम्हारे पास कोई सचेत करने वाला नहीं आया था? वे उत्तर देंगे: हाँ, एक सचेत करने वाला तो अवश्य हमारे पास आया था, परंतु हमने उसे झूठा कह दिया और कह दिया कि परमेश्वर ने कोई चीज़ नहीं उतारी। (हमने कह दिया कि) तुम लोग तो बस एक बड़ी पथभ्रष्टता में पड़े हुए हो। और वे कहेंगे: यदि हम सुनते या समझते तो आज इन नरक वालों में नहीं होते। इस प्रकार वे अपने पापकर्मों को स्वीकार कर लेंगे, तो अब धिक्कार हो इन नरक वालों पर।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ ﴿12﴾ وَأَسِرُّوا۟ قَوْلَكُمْ أَوِ ٱجْهَرُوا۟ بِهِۦٓ ۖ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿13﴾ أَلَا يَعْلَمُ مَنْ خَلَقَ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلْخَبِيرُ ﴿14﴾

इसके विपरीत जो बिन देखे अपने प्रभु से डरते हैं, उनके लिए क्षमा भी है और बहुत बड़ा प्रतिफल भी। (लोगो), तुम अपनी कोई बात छिपा कर कहो या खुलकर, वह दिलों के भेद तक जानता है। क्या वही न जानेगा जिसने पैदा किया है? यद्यपि वह बड़ा प्रज्ञावान और बड़ा ही जानकार है।

هُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ ذَلُولًا فَٱمْشُوا۟ فِى مَنَاكِبِهَا وَكُلُوا۟ مِن رِّزْقِهِۦ ۖ وَإِلَيْهِ ٱلنُّشُورُ ﴿15﴾

(अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत यश देने वाला), वही जिसने धरती को तुम्हारे लिए एक आज्ञाकारी ऊंट बना दिया है, तो अब तुम उसके कंधों पर चलो फिरो और अपने प्रभु की जीविका में से खाओ और (याद रखो कि एक दिन) उसी की उपस्थिति में जी उठना है।

ءَأَمِنتُم مَّن فِى ٱلسَّمَآءِ أَن يَخْسِفَ بِكُمُ ٱلْأَرْضَ فَإِذَا هِىَ تَمُورُ ﴿16﴾ أَمْ أَمِنتُم مَّن فِى ٱلسَّمَآءِ أَن يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ كَيْفَ نَذِيرِ ﴿17﴾ وَلَقَدْ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ ﴿18﴾

क्या तुम उससे निर्भय हो गए जो आकाश में है कि वह तुमको धरती में धंसा दे, फिर अचानक तुम देखो कि वह अंधाधुंध चल पड़ी है? या तुम उससे निर्भय हो गए जो आकाश में है कि वह तुम पर पत्थर बरसाने वाली हवा भेज दे? सो अब तुम जानोगे कि कैसी है मेरी चेतावनी! जो इनसे पहले चल बसे हैं, उन्होंने भी इसी प्रकार नकार दिया था तो (देख लो कि) कैसी थी मेरी डांट!

أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلطَّيْرِ فَوْقَهُمْ صَـٰٓفَّـٰتٍ وَيَقْبِضْنَ ۚ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا ٱلرَّحْمَـٰنُ ۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَىْءٍۭ بَصِيرٌ ﴿19﴾

(ये नहीं सोचते)। क्या इन लोगों ने अपने ऊपर (उड़ते हुए) पक्षी नहीं देखे? पर फैलाए हुए, और वे (इसी प्रकार) उनको समेट भी लेते हैं। परम दयालु परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जो उन्हें थामे हुए हो। निस्संदेह, वही हर चीज़ पर निरीक्षक है।

أَمَّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى هُوَ جُندٌ لَّكُمْ يَنصُرُكُم مِّن دُونِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ۚ إِنِ ٱلْكَـٰفِرُونَ إِلَّا فِى غُرُورٍ ﴿20﴾ أَمَّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى يَرْزُقُكُمْ إِنْ أَمْسَكَ رِزْقَهُۥ ۚ بَل لَّجُّوا۟ فِى عُتُوٍّ وَنُفُورٍ ﴿21﴾

या बताओ, (तुम दण्ड की मांग करते हो तो) तुम्हारे पास वह कौन सी सेना है जो परम दयालु परमेश्वर के विरुद्ध तुम्हारी सहायता करेगा? सत्य यह है कि ये नकारने वाले स्पष्ट धोखे में पड़े हैं। या फिर बताओ, वह कौन है जो तुम्हें जीविका देगा, यदि वह अपनी जीविका रोक ले? नहीं, (ये जानते हैं कि कोई नहीं), अपितु ये अवज्ञा और सत्य के विरोध पर अड़े हुए हैं।

أَفَمَن يَمْشِى مُكِبًّا عَلَىٰ وَجْهِهِۦٓ أَهْدَىٰٓ أَمَّن يَمْشِى سَوِيًّا عَلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿22﴾ قُلْ هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَكُمْ وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۖ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ ﴿23﴾ قُلْ هُوَ ٱلَّذِى ذَرَأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿24﴾

फिर क्या जो अपना मुँह नीचे की ओर झुकाए हुए चले, वह अधिक सीधा मार्ग पाने वाला है या वह जो सीधा एक सीधे मार्ग पर चल रहा है? (इन पर अफ़सोस), इनसे कहो: वही है जिसने तुम्हें (मनुष्य के रूप में) उठाया और तुम्हारे लिए कान और आँखें और दिल बनाए (ताकि तुम सत्य को समझो), पर तुम कम ही आभार व्यक्त करते हो। इनसे कह दो, वही है जिसने तुम्हें धरती में बोया। (वह अपनी खेती अवश्य काटेगा) और (इसके लिए) तुम उसी की ओर इकट्ठे किए जाओगे।

وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿25﴾ قُلْ إِنَّمَا ٱلْعِلْمُ عِندَ ٱللَّهِ وَإِنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿26﴾ فَلَمَّا رَأَوْهُ زُلْفَةً سِيٓـَٔتْ وُجُوهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَقِيلَ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تَدَّعُونَ ﴿27﴾

ये कहते हैं कि यदि तुम सच्चे हो तो यह वचन कब पूरा होगा? इनसे कह दो, इसका ज्ञान तो परमेश्वर के पास है, मैं तो केवल एक स्पष्ट सचेत कर देने वाला हूं। (इस समय यही कहते हैं), परंतु जब उसको देखेंगे कि पास आ लगा है तो इन नकारने वालों के चेहरे बिगड़ जाएँगे और इनसे कहा जाएगा: यही है जिसकी तुम मांग कर रहे थे।

قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَهْلَكَنِىَ ٱللَّهُ وَمَن مَّعِىَ أَوْ رَحِمَنَا فَمَن يُجِيرُ ٱلْكَـٰفِرِينَ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ ﴿28﴾

(ये इससे क्या डरते? ये तो तुम्हारे लिए समय बदलने की प्रतीक्षा में हैं, हे पैग़ंबर)। इनसे पूछो कि तुमने कभी सोचा है कि परमेश्वर मुझे और मेरे साथियों का नाश कर दे या हम पर दया करे तो (इससे तुम्हें क्या प्राप्त होगा? तुम यह बताओ कि फिर) कौन है जो नकारने वालों को कष्टदायक दण्ड से बचा लेगा?

قُلْ هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ءَامَنَّا بِهِۦ وَعَلَيْهِ تَوَكَّلْنَا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿29﴾ قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَصْبَحَ مَآؤُكُمْ غَوْرًا فَمَن يَأْتِيكُم بِمَآءٍ مَّعِينٍۭ ﴿30﴾

कह दो, (हम अपने बारे में कोई दावा नहीं करते। हाँ, यह अवश्य है कि) वह सर्वथा दया है। हम उसी को मान चुके हैं और हमने उसी पर भरोसा किया है। सो शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़ा हुआ है। इनसे कहो: कभी तुमने सोचा है कि यदि तुम्हारा यह पानी धरती में उतर जाए तो फिर कौन है जो पानी की स्वच्छ धाराएं तुम्हें निकाल कर ला देगा?1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात बारिश न होने के कारण कम होकर मटमैला हो जाए। ↩