सूरह 61
अस्-सफ़्फ़्
मदनी · 14 आयतें · 7 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को पैग़ंबर मानने के बाद उनकी सहायता के लिए सशस्त्र संघर्ष (जिहाद) से बचने वालों और दूसरी में उनकी क़द्र न पहचानने और उनके अनुसरण (इत्तिबा’अ) और आज्ञापालन (इता'अत) में बेपरवाही करने वालों को चेतावनी दी गई है। दोनों सूरतों में संबोधन उन लोगों से है जो पैग़ंबर को मानने का दावा करते हैं और इनकी विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि ये मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) के चरण में अवतरित हुई हैं।1
टिप्पणियाँ 1
- तज़्कियह और तत्हीर के शब्द ग़ामिदी साहब द्वारा समान अर्थों में ज्ञान और क्रिया से संबन्धित चीज़ों के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त किए गए हैं; तत्हीर शब्द का एक अतिरिक्त अर्थ होता है वर्गीकरण या मानने वालों को नकारने वालों और ढोंगियों से अलग करना। जहां भी यह अतिरिक्त अर्थ अभिप्राय होता है, वहां ग़ामिदी साहब ने इसे सूरह की व्याख्या में स्पष्ट किया है। [अनुवादक] ↩
पहली सूरह—अस्-सफ़्फ़—का विषय कमज़ोर मुसलमानों को इस बात पर सचेत करना है कि यदि रसूल को मानने के बाद उनकी सहायता के लिए जिहाद से भागोगे तो तुम्हारा हाल भी वही होगा जो यहूदियों का हुआ। इस मामले में सही आचरण यहूदियों का नहीं, अपितु पैग़ंबर ईसा मसीह के शिष्यों व साथियों (हव्वारियों) का है। इसलिए, अनुसरण करना है तो उनका करो। यहूदी तो सदा के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन से वंचित हो चुके हैं।
दूसरी सूरह—अल्-जुमु’अ:—का विषय इन्हीं मुसलमानों को ध्यान दिलाना है कि रसूल का अस्तित्व उनके लिए परमेश्वर का एक महान वरदान हैं। वे उनका महत्व पहचानें और यहूदियों के ईर्ष्यापूर्ण दुष्प्रचार से प्रभावित होकर अपने आप को इस वरदान से वंचित न कर बैठें। रसूल के उपदेश और उनकी लाई हुई शरीअत का सम्मान उन्हें दुनिया की हर चीज़ से अधिक प्रिय होना चाहिए। उन्हें सावधान किया गया है कि यदि इस मामले में बेपरवाही हुई, तो उनका अंत भी वही होगा, जो इससे पहले यहूदियों का हो चुका है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
धरती और समस्त आकाशों की हर चीज़ ने परमेश्वर का गुणगान किया है और वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।
हे मानने वालो, तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं? परमेश्वर के निकट बहुत घृणित बात है कि तुम वह बात कहो जो करते नहीं हो। परमेश्वर तो उन्हीं लोगों से प्रेम करता है जो उसके मार्ग में कतार बांधे हुए इस प्रकार लड़ते हैं, मानो वे सीसा पिलाई हुई दीवार हैं।
(यहूदियों का आचरण भी यही था)। याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: मेरी क़ौम के लोगो, (बार-बार की अवज्ञा से) तुम मुझे क्यों पीड़ा देते हो, यद्यपि तुम भलीभांति जानते हो कि मैं तुम्हारे पास परमेश्वर का रसूल हो कर आया हूं? परंतु (इस चेतावनी के होते हुए भी) जब उन्होंने टेढ़ा आचरण अपनाया तो परमेश्वर ने उनके दिल टेढ़े कर दिए। परमेश्वर ऐसे अवज्ञाकारी लोगों का कभी मार्गदर्शन नहीं करता।
(उनका यह टेढ़ा आचरण इसी प्रकार बना रहा)। याद करो, जब मर्यम-पुत्र ईसा ने कहा: हे इस्राईलियो, मैं तुम्हारी ओर परमेश्वर का भेजा हुआ रसूल हूं, तौरात कि उन भविष्यवाणियों का पूरक हूं जो मुझसे पहले उपलब्ध हैं, और एक रसूल की शुभ सूचना देने वाला हूं, जो मेरे बाद आएगा जिसका नाम अहमद होगा। परंतु उनके पास जब वह अत्यंत स्पष्ट निशानियाँ लेकर आ गया तो उन्होंने कहा: यह तो स्पष्ट जादू है।
(यही टेढ़ा आचरण अब भी बना है। भला बताओ कि) उस व्यक्ति से बढ़कर दुष्ट कौन होगा जो परमेश्वर के साथ झूठी बातें बांधे, यद्यपि उसे इस्लाम की ओर बुलाया जा रहा हो। सत्य यह है कि इस प्रकार के दुष्ट लोगों का परमेश्वर मार्गदर्शन नहीं करता। परमेश्वर के इस प्रकाश को वे अपने मुँह की फूँकों से बुझा देना चाहते हैं, और परमेश्वर का निर्णय है कि वह अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा, चाहे इन नकारने वालों को यह कितना ही बुरा लगे। वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्य धर्म के साथ भेजा है ताकि (इस भूभाग के) सभी धर्मों पर उसको प्रभावी कर दे, चाहे ये मुश्रिक भी इसे कितना ही बुरा समझें।
हे मानने वालो, मैं तुमको वह व्यापार बताऊं जो तुम्हें कष्टदायक यातना से मुक्ति दे? (यहूदियों ने जो आचरण अपनाया है, उसके विपरीत), तुम परमेश्वर और उसके रसूल को मान जाओगे, जिस प्रकार कि मानना चाहिए, और अपनी जान और संपत्ति से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद करोगे। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम समझो। इसके बदले में परमेश्वर तुम्हारे पापकर्म क्षमा कर देगा और तुम्हें ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी और सबसे अच्छे घर प्रदान करेगा जो अनंत बाग़ों में होंगे। यही बड़ी सफलता है। और एक अन्य चीज़ भी प्रदान करेगा जो तुम चाहते हो, अर्थात परमेश्वर की सहायता और विजय जो शीघ्र ही प्राप्त हो जाएगी। मानने वालों को इसकी शुभ सूचना दो, (हे पैग़ंबर)।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात मक्का पर विजय, जिसके चाहत मक्का से प्रवास की बाद हर मुसलमान के दिल घर किए हुए थी। ↩
हे मानने वालो, परमेश्वर के सहायक बनो, जिस प्रकार मर्यम-पुत्र ईसा ने हवारियों से कहा था: कौन परमेश्वर के मार्ग में मेरा सहायक बनता है? हवारियों ने उत्तर दिया: हम परमेश्वर के सहायक हैं। अतः इस्राईलियों में से एक समूह मान गया और एक बड़ा समूह अपने कुफ़्र पर जमा रहा। फिर हमने मानने वालों की उनके शत्रुओं के विरुद्ध सहायता की तो वही प्रभावी हो कर रहे।