सूरह 18
अल्-कह्फ़
मक्की · 110 आयतें · 36 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का मूलभाव सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है, जो पिछली सूरतों से चला आ रहा है।
पहली सूरह—अल्-कह्फ़—में इस विषय के तथ्य उन घटनाओं से स्पष्ट किए गए हैं जिनके बारे में मक्का के क़ुरैश क़बीले ने अहल-ए-किताब, विशेषकर ईसाइयों द्वारा सिखाए गए प्रश्न पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की परीक्षा के लिए उनके सामने पेश किए हैं।
दूसरी सूरह—मर्यम—में इन सिखाने वालों पर परमेश्वर ने स्वयं इनके धर्म की सच्चाई को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है, ताकि क़ुरैश को सावधान किया जा सके कि जिनका अपना कोई आधार नहीं है, यदि उनकी शह पर परमेश्वर के पैग़ंबर की अवमानना करोगे तो देख लो कि अपने आप को परमेश्वर के कितने बड़े उपहार से वंचित कर लोगे।
दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश से है और इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के 'इत्माम-ए-हुज्जत' के चरण में उस समय अवतरित हुई हैं, जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) का समय पास आ गया है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
आभार परमेश्वर ही के लिए है जिसने अपने दास पर यह ग्रंथ उतारा और इसमें कोई टेढ़ापन नहीं रखा है। हर प्रकार से ठीक और सीधा ताकि नकारने वालों को वह उसकी ओर से एक कष्टदायक यातना से सावधान कर दे और मानने वालों को, जो भले कर्म कर रहे हैं, शुभ सूचना सुना दे कि उनके लिए बहुत अच्छा फल है, जिसमें वे सदा रहेंगे। उन लोगों को सचेत कर दे जो कहते हैं कि परमेश्वर ने संतान बना रखी है। उन्हें इस बात का कोई ज्ञान नहीं है, उनके पूर्वजों को भी नहीं था। बड़ी ही गंभीर बात है जो उनके मुँहों से निकल रही है। सत्य यह है कि वे केवल झूठ कह रहे हैं।
फिर यदि वे इस बात को न मानें तो शायद तुम उनके पीछे अपने आप को दुख से मार डालोगे। धरती में जो कुछ है, उसको हमने धरती की सजावट बनाया है, ताकि हम लोगों की परीक्षा करें कि उनमें अच्छे कर्म करने वाला कौन है। (वे इसी सजावट पर मोहित हुए हैं, यद्यपि) हम उन सब चीज़ों को जो धरती पर हैं, (एक दिन पूर्णतः नष्ट करके उसको) एक उजाड़ मैदान बना देने वाले हैं।
क्या तुम समझते हो कि गुफ़ा और रक़ीम वाले हमारी निशानियों में से बहुत अद्भुत निशानी थे? उस समय, जब उन नवयुवकों ने गुफ़ा में शरण ली, फिर (अपने प्रभु से) प्रार्थना की कि हे हमारे प्रभु, हम को तू विशेष अपने पास से कृपा प्रदान कर और हमारे इस मामले में तू हमारे लिए मार्गदर्शन का प्रबंध कर दे। इस पर कई वर्ष के लिए हमने उस गुफ़ा में उनके कानों पर थपकी दी। फिर हमने उनको उठाया ताकि देखें कि दोनों समूहों में से किसने उनके ठहरने की अवधि की उचित गणना की है?12
हम उनकी कथा तुम्हें ठीक-ठीक सुनाते हैं। वे कुछ नवयुवक थे जिन्होंने अपने प्रभु को माना और उनके मार्गदर्शन में हमने वृद्धि प्रदान की। और उनके दिल उस समय दृढ़ कर दिए, जब वे (तौहीद का संदेश लेकर) उठे और घोषणा की कि हमारा प्रभु वही है जो समस्त आकाशों और धरती का प्रभु है। हम उसके अतिरिक्त किसी अन्य देवता को कदापि नहीं पुकारेंगे और यदि ऐसा करेंगे तो सत्य से अत्यंत हटी हुई बात करेंगे। यह हमारी क़ौम के लोग हैं कि इन्होंने उसके अतिरिक्त कुछ अन्य उपास्य बना रखे हैं। ये उनके पक्ष में कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं प्रस्तुत करते? फिर उनसे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो परमेश्वर पर झूठ मढ़ें?
(वे यही आह्वान करते रहे, यहाँ तक कि लोग उनकी जान के पीछे पड़ गए तो शुभ प्रेरणा हुई कि) जब तुम उनसे और उनके देवताओं से, जिन्हें वे परमेश्वर के अतिरिक्त पूजते हैं, अलग हो गए हो तो जाओ और अमुक गुफ़ा में जाकर शरण लो। तुम्हारा प्रभु अपनी कृपा तुम्हारे लिए फैला देगा और तुम्हारे इस मामले में जो कुछ तुम्हारी आवश्यकता है, तुमको उपलब्ध कराएगा।
तुम सूरज को देखते कि जब निकलता है तो उनकी गुफ़ा से दाईं ओर को बचा रहता है और जब डूबता है तो उनसे बाईं ओर को कतरा जाता है और वे उसके सहन में पड़े हैं। यह परमेश्वर की निशानियों में से है। जिसका मार्गदर्शन परमेश्वर करे, वही मार्गदर्शन पाने वाला है और जिसको परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) पथभ्रष्टता में डाल दे तो उसके लिए तुम कोई सहायक मार्गदर्शक नहीं पाओगे।
तुम उनको (देखते तो) समझते कि जाग रहे हैं, यद्यपि वे सो रहे थे। हम उनको दाएँ और बाएँ करवट दिलवाते रहते थे और उनका कुत्ता चौखट पर अपने दोनों हाथ फैलाए बैठा था। यदि तुम्हारी दृष्टि कहीं उनपर पड़ जाती तो उनसे तुम उल्टे पाँव भाग खड़े होते और तुम्हारे अंदर उनका आतंक बैठ जाता।
(हमने जिस प्रकार अपनी शक्ति से उन्हें सुलाया था), उसी प्रकार हमने उनको जगाया ताकि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें से एक पूछने वाले ने पूछा: तुम यहाँ कितनी देर ठहरे होगे? वे बोले: हम एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरे होंगे। बोले: तुम्हारा प्रभु ही भलीभांति जानता है कि तुम कितनी देर ठहरे हो। जो भी है, अपने में से किसी को अपनी यह धनराशि देकर शहर भेजो, फिर वह अच्छे से देखे कि विशुद्ध खाना शहर के किस हिस्से में मिलता है और उससे तुम्हारे लिए कुछ खाना ले आए। उसे चाहिए कि वह चुपके से जाए और किसी को तुम्हारी सूचना न होने दे। इसलिए कि यदि वे तुम्हारी सूचना पाएंगे तो पत्थर मार मार कर तुम्हारी हत्या कर देंगे या अपने धर्म में लौटा लेंगे और ऐसा हुआ तो तुम कभी सफलता नहीं पाओगे।
हमने इसी प्रकार (अपनी शक्ति से) लोगों को उनके बारे में अवगत कर दिया ताकि वे जान लें कि परमेश्वर का वचन सच्चा है और क़यामत के आने में कोई संदेह नहीं है। भला विचार करो, जब उनके मामले में लोग आपस में विवाद कर रहे थे तो कुछ लोगों ने कहा: इनकी गुफ़ा पर एक भवन बना दो और (अधिक खोज न करो), इनका प्रभु इनकी दशा को भलीभांति जानता है। इसके विपरीत जिन लोगों का विचार उनके मामले में प्रभावी रहा, उन्होंने कहा: हम तो इनकी गुफ़ा पर एक मस्जिद बनाएंगे।
अब ये लोग कहेंगे कि वे तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था और (इनमें से) कुछ कहेंगे कि पांच थे और छठा उनका कुत्ता था, केवल अटकलबाज़ी! और कुछ कहेंगे कि सात थे और आठवां उनका कुत्ता था। कह दो, मेरा प्रभु भलीभांति जानता है कि वे कितने थे। उनको थोड़े ही लोग जानते हैं। इसलिए, (हे पैग़ंबर), तुम उनके बारे में बहस न करो, सिवाय इसके कि टालने के लिए कुछ कहना पड़े और न उनके विषय में उनमें से किसी से पूछो, — और (देखो), किसी मामले के लिए यह न कहा करो कि मैं कल यह कर दूंगा। (तुम कुछ नहीं कर सकते), हाँ, इस स्थिति में कि परमेश्वर चाहे। और जब तुम भूल जाओ तो तुरंत अपने प्रभु को याद करो और कहो, आशा है कि मेरा प्रभु इससे भी कम समय में उचित बात की ओर मेरा मार्गदर्शन कर देगा।
(इसी प्रकार कहेंगे कि) वे अपनी गुफ़ा में तीन सौ साल रहे और उसके ऊपर नौ साल भी। कह दो, उनके रहने की अवधि परमेश्वर ही भालिभांति जानता है। धरती और समस्त आकाशों का परोक्ष उसी की जानकारी में है। कैसा उत्तम है वह देखने और सुनने वाला! उसको छोड़ उनकी बिगड़ी बनाने वाला कोई नहीं है और अपने अधिकार में वह किसी को सहभागी भी नहीं बनाता।
(तुम इन की चिंता न करो, हे पैग़ंबर), और तुम्हारे प्रभु का जो ग्रंथ तुम्हारी ओर वह्य किया जा रहा है, उसे लोगों को सुना दो। परमेश्वर के नियमों को कोई बदलने वाला नहीं है। तुम (उन से हटकर कुछ चाहोगे तो) उसके अतिरिक्त कदापि कोई शरण की जगह नहीं पाओगे। तुम अपने आपको उन लोगों के साथ जमाए रखो जो अपने प्रभु की प्रसन्नता में सुबह व शाम उसको पुकारते हैं। तुम्हारी आँखें दुनिया के जीवन की चमक दमक के लिए उनसे हटने न पाएँ और तुम उन लोगों की बात पर ध्यान न दो जिनके दिल हमने अपनी याद से बेपरवाह कर दिए हैं और जो अपनी इच्छाओं के पीछे पड़े हैं और जिन का मामला हद से आगे बढ़ गया है। इनसे कहो, तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है। तो जिसका जी चाहे, मान ले और जिसका जी चाहे, नकार दे। (अपितु याद रखो कि) हमने अत्याचारियों के लिए एक ऐसी आग तैयार कर रखी है जिसके ऊँचे तंबू उनको अपने घेरे में ले लेंगे। यदि वे पानी के लिए प्रार्थना करेंगे तो उनकी प्रार्थना का उत्तर उसी पानी से दिया जाएगा जो पिघले हुए तांबे के समान होगा। वह चेहरों को भून डालेगा। कैसा बुरा पानी होगा और कैसा बुरा ठिकाना!
रहे वे लोग जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए तो अवश्य हम उन लोगों का फल बर्बाद नहीं करेंगे जो अच्छे ढंग से कर्म करें। उनके लिए सदा रहने वाले बाग़ होंगे, इस प्रकार कि उनके पाँव के नीचे नहरें बह रही होंगी। उन्हें वहां स्वर्ण कंगन पहनाए जाएँगे। वे सुंदुस और इस्तब्रक के हरे वस्त्र पहनेंगे, आसनों पर टेक लगाए हुए उसमें बैठे होंगे। कैसा अच्छा बदला है और कैसा अच्छा ठिकाना!
तुम इनके सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करो। दो व्यक्ति थे। उनमें से एक को हमने अंगूरों के दो बाग़ दे रखे थे और उनके आसपास खजूरों के पेड़ लगा दिए थे और उनके बीच खेती के भूखंड रख दिए थे। दोनों बाग़ बहुत फल लाते, उसमें कोई कमी नहीं करते थे। और उनके बीच-बीच में हमने एक नहर दौड़ा दी थी। उसके फलों का मौसम हुआ तो उसने अपने साथी से बहस करते हुए कहा: मैं तुमसे धन में भी अधिक हूं और मेरा समूह भी प्रबल है। उसने (यह बातें करते हुए) अपने बाग़ में प्रवेश किया तो अपनी जान पर अन्याय कर रहा था। उसने कहा: मैं नहीं समझता कि यह कभी बर्बाद हो जाएगा। और मैं नहीं समझता कि क़यामत कभी आएगी। फिर भी मैं यदि अपने प्रभु की ओर लौटाया भी गया तो जहाँ लौटकर जाऊंगा, इससे अच्छी जगह ही पाऊंगा।
उसके साथी ने उससे बात करते हुए उत्तर दिया: क्या उस सत्ता का इनकार कर रहे हो जिसने तुम्हें मिट्टी से बनाया, फिर पानी की एक बूंद से, फिर तुमको एक पूरा मनुष्य बनाकर खड़ा किया? (तुम जो चाहे कहो), परंतु (मैं तो यही समझता हूं कि) मेरा प्रभु वही परमेश्वर है और मैं अपने प्रभु के साथ किसी को साझीदार नहीं बनाता। तुम जब अपने बाग़ में प्रवेश कर रहे थे तो तुमने यह क्यों नहीं कहा कि जो परमेश्वर ने चाहा, परमेश्वर के बिना किसी में कोई सामर्थ्य नहीं है? यदि तुम मुझको देखते हो कि मैं धन और संतान में तुमसे कम हूं, तो आश्चर्य नहीं कि मेरा प्रभु मुझे तुम्हारे बाग़ से अच्छा बाग़ प्रदान करे और तुम्हारे बाग़ पर आकाश से कोई ऐसी विपदा भेज दे कि वह उजाड़ मैदान होकर रह जाए। या उसका पानी धरती में उतर जाए, फिर तुम उसको किसी प्रकार पा न सको।
(अतः यही हुआ) और उसका सारा फल (दंड के) फेर में आ गया। तो जो कुछ उसने बाग़ पर ख़र्च किया था, वह उस पर अपने हाथ मलता रह गया। उसका बाग़ अपनी जालियों पर गिरा पड़ा था और वह कह रहा था: काश, मैं अपने प्रभु के साथ किसी को साझीदार न बनाता। उसके पास कोई जत्था नहीं था जो परमेश्वर के विरुद्ध उसकी सहायता करता और न वह स्वयं (उसका) बदला ले सकता था। उस समय सारा अधिकार केवल परम सत्य परमेश्वर का था। (सत्य यह है कि) उसी का प्रतिफल अच्छा है और जिस अंत तक वह पहुंचाए, वही सबसे अच्छा अंत है।1
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- अर्थात जब न्याय (दण्ड) की घड़ी आ गई। ↩
(ये जिस पर मोहित हो गए हैं), इन्हें उस दुनिया के जीवन का उदाहरण सुनाओ। यह ऐसा है जैसे पानी हो जिसे हमने आकाश से (बारिश बरसा कर) उतारा, फिर उससे धरती की वनस्पति अच्छी घनी हुई, फिर कण-कण होकर रह गई जिसे हवाएं उड़ाती फिरी हैं। परमेश्वर प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखने वाला है। ये धन और पुत्र इसी दुनिया के जीवन की चमक-दमक हैं। सत्य यह है कि तुम्हारे प्रभु के पास फल की दृष्टि से वह कर्म उत्तम हैं जो अच्छे और बाक़ी रहने वाले हैं और इस दृष्टिकोण से भी क्यों उनसे आशाएं जोड़ी जाएँ। उस दिन का विचार करो, जब हम पर्वतों को चला देंगे और तुम धरती को देखोगे कि पूर्णतः वस्त्रहीन हो गई है और हम इनको ला कर इकट्ठा करेंगे, फिर इनमें से किसी को छोड़ेंगे नहीं। और सब कतारें बाँधें हुए तुम्हारे प्रभु की सभा में लाए जाएँगे। — तुम हमारे पास आ गए ना, जिस प्रकार हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। हालांकि तुमने तो यह समझ रखा था कि हम तुम्हारे लिए वादे का कोई समय निर्धारित ही नहीं करेंगे। — उस समय कर्मों का खाता सामने रख दिया जाएगा। फिर तुम अपराधियों को देखोगे कि जो कुछ उसमें (लिखा) है, वे उससे डर रहे होंगे और कहेंगे कि हाय हमारा दुर्भाग्य! यह कैसा खाता है कि न कोई छोटी बात इसने लिखने से छोड़ी है न बड़ी। उन्होंने जो कुछ (दुनिया में) किया था, सब अपने सामने उपस्थित पाया और तेरा प्रभु (उस दिन) किसी पर कोई अत्याचार नहीं करेगा।
याद करो, जब हमने फ़रिश्तों को आदेश दिया कि आदम को सज्दा करो तो वे सजदे में गिर गए, परंतु इब्लीस नहीं माना, वह जिन्न प्रजाति में से था, तो अपने प्रभु के आदेश से निकल भागा। अब क्या तुम मुझे छोड़कर उसको और उसके वंश को अपनी बिगड़ी बनाने वाला बना रहे हो, यद्यपि वे तुम्हारे शत्रु हैं? बड़ा ही बुरा विकल्प है जिसे ये दुष्ट अपना रहे हैं! (ये उनको मेरा सहभागी बना रहे हैं, जबकि) मैंने इन (शैतानों) को न धरती और आकाशों की रचना करते समय बुलाया था और न स्वयं इनकी रचना करते समय बुलाया था। मैं ऐसा नहीं हूं की भटकाने वालों को अपना मित्र बना लूँ।1
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- इस वाक्य की शैली व्यंग्यात्मक है। तात्पर्य यह है कि मैंने तो अपने किसी कार्य में उनसे कभी कोई सहायता नहीं ली, किंतु तुम्हारा हाल यह है कि तुम मेरी संप्रभुता में उन्हें भागीदार ठहरा रहे हो कि जैसे ये आकाश व पृथ्वी और इनमें बसने वाले प्राणी, सब उन्हीं के सहयोग से अस्तित्व में आए हैं।। ↩
(ये उस दिन क्या करेंगे), जिस दिन परमेश्वर कहेगा कि अब उनको पुकारो जिन्हें तुम मेरा सहभागी समझते थे? अतः उनको पुकारेंगे, परंतु वे उन्हें कोई उत्तर नहीं देंगे। हम उनके बीच एक जानलेवा खाई ड़ाल देंगे। और ये अपराधी उसकी आग को देखेंगे और समझ लेंगे कि उसी में गिरने वाले हैं और उससे बचने के लिए वे कोई मार्ग नहीं पा सकेंगे।
हमने इस क़ुरआन में लोगों के मार्गदर्शन के लिए सब प्रकार की चेतावनियों का अनेक प्रकार से वर्णन कर दिया है, परंतु मनुष्य बड़ा ही झगड़ालू घटित हुआ है। जब इनके पास मार्गदर्शन आ चुका तो इन लोगों को मानने और अपने प्रभु से क्षमा मांगने से यही चीज़ रोक रही है कि पूर्वकालीन लोगों का अंतिम परिणाम इनके लिए भी प्रकट हो जाए या दण्ड इनके सामने आ खड़ा हो। (इन्हें बताओ कि) रसूलों को तो हम केवल इसलिए भेजते हैं कि शुभ सूचना दें और सचेत कर दें और इन नकारने वालों की दशा यह है कि असत्य की सहायता से कुतर्क करते हैं कि इसके माध्यम से सत्य को नीचा दिखाएँ और मेरी आयतों को इन्होंने मज़ाक़ बना रखा है और उस चीज़ को भी जिससे इन्हें सचेत किया गया है। उनसे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जिन्हें उनके प्रभु की आयतों के माध्यम से स्मरण कराया जाए तो वे उनसे मुँह फेर लें और अपने हाथों की कमाई भूल जाएं जो आगे भेज चुके हैं। इनके दिलों पर हमने (इसी कारण से) पर्दे डाल दिए हैं कि इस क़ुरआन को न समझें और इनके कानों में भारीपन पैदा कर दिया है कि इसको न सुनें। तुम इनको सन्मार्ग की ओर कितना ही बुलाओ, ये इस दशा में तो कदापि मार्गदर्शन नहीं पाएंगे। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु बड़ा क्षमा करने वाला और दया करने वाला है। वह इनके कर्मों के फलस्वरूप इन्हें (इसी समय) पकड़ना चाहता तो इन पर तुरंत दण्ड भेज देता, परंतु इनके लिए एक समय निर्धारित है। (वह जब आ जाएगा तो) ये उसके विरुद्ध कोई शरण की जगह नहीं पाएंगे। ये बस्तियां (तुम्हारे सामने) हैं। जब उनके लोग दुष्ट हो गए तो हमने उन्हें नष्ट कर दिया और उनके विनाश के लिए भी हमने एक समय निर्धारित कर रखा था।
(इनके विरुद्ध धीरज रखो, हे पैग़ंबर, और इसके लिए वह घटना सामने रखो), जब मूसा ने अपने शिष्य से कहा कि मैं चलता रहूंगा, यहाँ तक कि दो नदियों के संगम के स्थान पर पहुंच जाऊं या इसी प्रकार कई वर्षों तक चलता रहूँ। अतः जब वे नदियों के संगम के स्थान पर पहुंचे तो अपनी (नाश्ते की भुनी हुई) मछली भूल गए और उसने नदी में सुरंग लगाकर अपना रास्ता लिया। फिर जब आगे बढ़े तो मूसा ने अपने शिष्य से कहा कि अब हमारा खाना लाओ। हमारी इस यात्रा से तो हमको बड़ी थकान हो गई। शिष्य ने कहा: क्या बताऊं, जब हम उस चट्टान के पास ठहरे हुए थे तो उस समय मुझे मछली का ध्यान नहीं रहा और यह शैतान ही था जिसने मुझे बेपरवाह कर दिया कि मैं उसे याद रखूं और उसने अद्भुत ढंग से नदी में अपना रास्ता खोज लिया। मूसा ने कहा: यही तो वह स्थान है जो हम ढूंढ रहे थे। अतः वे अपने पदचिह्न देखते हुए लौटे। तो हमारे भक्तों में से एक भक्त को वहाँ पाया जैस्पर हमने अपनी विशेष कृपा की थी और अपने पास से उसे एक विशेष ज्ञान प्रदान किया था।1
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- यह घटना स्वप्न-लोक की भी हो सकती है। पैग़ंबरों के स्वप्न चूँकि सर्वथा सत्य और सार्थक होते हैं, इसलिए कुरआन और बाइबल, दोनों से ज्ञात होता है कि कभी-कभी कुछ घटनाएँ बिल्कुल इसी ढंग से व्यक्त की जाती हैं, जिस प्रकार सामान्य जागृत अवस्था की घटनाओं का वर्णन होता है। ↩
मूसा ने उससे निवेदन किया कि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं इस शर्त पर आपके साथ रहूँ कि जो ज्ञान आप को दिया गया है, आप उसमें से कुछ मुझे भी सिखाएँगे? उसने उत्तर दिया: तुम मेरे साथ धैर्य नहीं रख सकोगे। और जो चीज़ तुम्हारे ज्ञान-क्षेत्र से बाहर होगी, भला तुम उस पर धैर्य रख भी कैसे सकते हो? मूसा ने कहा: प्रभु ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान पाएंगे और मैं किसी विषय में आप की अवज्ञा नहीं करूंगा।
उसने कहा: फिर यदि मेरे साथ रहना है तो मुझसे कोई बात नहीं पूछना, जब तक मैं स्वयं तुमसे उसकी बात न करूँ। अंततः वे दोनों चल पड़े, यहाँ तक कि जब (एक जगह) नाव में सवार हुए तो उस व्यक्ति ने नाव में छेद कर दिया। मूसा ने कहा: आपने इसमें छेद कर दिया ताकि इस नाव के सभी लोगों को डुबो दें? यह तो आप ने बड़ा ही अटपटा कार्य कर डाला है। उसने कहा: मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धैर्य नहीं रख सकोगे? मूसा ने कहा: मैं जिस चीज़ को भूल गया, उस पर मेरी पकड़ न कीजिए और मेरे विषय में मुझपर अधिक कठोरता न कीजिए।
फिर दोनों चले, यहाँ तक कि जब (रास्ते में) एक लड़के से भेंट हुई तो उसने उस लड़के की हत्या कर डाली। मूसा ने कहा: आपने एक निर्दोष की हत्या कर ली, यद्यपि उसने किसी की हत्या नहीं की थी? यह तो आपने अत्यंत बुरा कार्य किया है। उसने कहा: मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धैर्य नहीं रख सकोगे? मूसा ने कहा: इसके बाद यदि मैं आपसे कुछ पूछूं तो आप मुझे साथ न रखें। यह अंतिम खेद और स्वीकार कर लें। इस पर दोनों आगे बढ़े, यहाँ तक कि जब एक बस्ती वालों के पास पहुंचे तो वहाँ के लोगों से खाना खिलाने को कहा, परंतु उन्होंने उनका आतिथ्य नहीं किया। फिर उन्होंने वहाँ एक दीवार देखी जो गिरने वाली थी तो उसने वह दीवार खड़ी कर दी। मूसा ने कहा: यदि आप चाहते तो इस के लिए मज़दूरी ले सकते थे। उसने कहा: अब यह मेरे और तुम्हारे बीच अलग होने का समय है। मैं अभी उन बातों की वास्तविकता तुम्हें बताता हूँ जिन पर तुम धैर्य नहीं रख सके हो।
उस नाव का मामला यह है कि वह कुछ निर्धन व्यक्तियों की थी जो नदी में मेहनत-मज़दूरी करते थे। तो मैंने चाहा कि उसे दोषपूर्ण बना दूं, (इसलिए कि) उनके आगे एक राजा था जो हर नाव को बलपूर्वक छीन रहा था।
रहा लड़का तो उसके माता-पिता, दोनों आस्तिक थे। तो हमें आशंका हुई कि कहीं वह (बड़ा होकर) अपनी अवज्ञा और कुफ़्र से उन्हें परेशान न करे। अतः हमने चाहा कि उनका प्रभु उन्हें इसकी जगह ऐसी संतान दे जो पवित्रता में इससे अच्छी और करुणा और प्रेम में इससे बढ़कर हो।
और दीवार का मामला यह है कि वह नगर के दो अनाथ लड़कों की थी । उसके नीचे उनका खज़ाना था और उनका पिता एक भला व्यक्ति था। (यह खज़ाना उसी ने रखा था) तो तेरे प्रभु ने चाहा कि वे अपनी युवावस्था को पहुंचें और अपना खज़ाना स्वयं निकालें। यह तेरे प्रभु की कृपा से हुआ। और यह जो कुछ मैंने किया है, अपने विचार से नहीं किया है। यह है उन बातों की वास्तविकता जिन पर तुम धैर्य नहीं रख सके हो।
वे तुम से ज़ुल्-क़र्नेन के बारे में पूछ रहे हैं। इनसे कहो, मैं उसका कुछ वृत्तान्त अभी तुम्हें सुनाता हूं। हमने उसको धरती में सत्ता प्रदान की थी और उसको सब प्रकार के साधन दिए थे। फिर उसने (एक बार) एक अभियान की तैयारी की। यहाँ तक कि जब वह सूरज के डूबने के स्थान तक पहुंचा तो उसने सूरज को देखा कि एक मटमैले अश्वेत सरोवर में डूब रहा है और उसके पास उसे एक क़ौम मिली। हमने कहा: हे ज़ुल्-क़र्नेन, (यह तेरे अधिकार में हैं कि) चाहो तो इन्हें दण्ड दो और चाहो तो इनके बारे में भला व्यवहार अपनाओ। उसने कहा: जो इनमें से अत्याचार करेगा, हम उसे दण्ड देंगे, फिर वह अपने प्रभु की ओर लौटाया जाएगा तो वह भी उसे दण्ड देगा। इसके विपरीत जो मान लेगा और भले कर्म करेगा, उसके बदले में (उसके प्रभु के पास भी) भलाई है और हम भी उसके साथ अपना मामला आसान करेंगे।1
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- यह वास्तव में पश्चिम की ओर भूमि (land expanse) की अंतिम सीमा तक पहुँचने की अभिव्यक्ति है जिसके आगे सागर था और जहाँ सूर्यास्त के समय ऐसा दृश्य दिखाई देता था मानो वह किसी मटमैले अश्वेत सरोवर में डूब रहा है। ↩
फिर उसने एक दूसरे अभियान की तैयारी की। यहाँ तक कि जब वह सूर्योदय के स्थान तक पहुंचा तो उसको देखा कि वह एक ऐसी क़ौम पर उदय हो रहा है जिनके लिए हमने सूर्य के इधर कोई आड़ नहीं रखी थी। यह इसी प्रकार हुआ और जो कुछ ज़ुल्-क़र्नेन के पास था, उसे हम भलीभांति जानते थे।1
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- तात्पर्य यह है कि वे पूर्णतः असभ्य और जंगली थे। धूप की तीव्रता से बचने के लिए भवन बनाना तो दूर की बात, अपने लिए शिविर या तम्बू तक नहीं बना सकते थे। ↩
उसने फिर एक और अभियान की तैयारी की। यहाँ तक कि जब दो पर्वतों के बीच (एक दर्रे तक) पहुंचा तो उनके इस ओर उसको ऐसे लोग मिले जो कोई बात समझ नहीं पाते थे। उन्होंने निवेदन किया कि हे ज़ुल्-क़र्नेन, याजूज और माजूज इस धरती में उत्पात फैलाते हैं। तो क्या यह हो सकता है कि हम आपके लिए लागत की व्यवस्था करें और आप हमारे और उनके बीच कोई आड़ बना दें? उसने उत्तर दिया कि जो कुछ मेरे प्रभु ने मेरे अधिकार में दे रखा है, वही बहुत है। अपितु, तुम हाथ पाँव से मेरी सहायता करो, मैं तुम्हारे और उनके बीच एक दीवार खड़ी किए देता हूं। मुझे लोहे की शिलाएँ ला कर दो। (अतः वे दे दी गईं), यहाँ तक कि जब उसने दोनों पर्वतों के बीच खाली जगह को भर दिया तो कहा कि दहकाओ, यहाँ तक कि जब उसको आग कर दिया तो आदेश दिया कि लाओ, अब मैं इस पर पिघला हुआ ताँबा उंडेल दूं। अतः (यह ऐसी दीवार बन गई कि) याजूज औ माजूज अब न उस पर चढ़ सकते थे, न उसमें दरार डाल सकते थे। ज़ुल्-क़र्नेन ने कहा: यह मेरे प्रभु की कृपा है। फिर जब मेरे प्रभु का वादा व्यक्त होगा तो वह इसको गिरा कर बराबर कर देगा और मेरे प्रभु का वादा सत्य है।
उस दिन हम लोगों को छोड़ देंगे कि एक दूसरे से मौजों के समान टकरा रहे होंगे और नरसिंघा फूंका जाएगा और इस प्रकार हम उन सबको इकट्ठा कर लेंगे। उस दिन हम नरक को उन नकारने वालों के सामने प्रस्तुत करेंगे जिनकी आंखों पर मेरे स्मरण से पर्दा पड़ा रहा और वे सुनने को झेल नहीं पाते थे।
फिर क्या ये नकारने वाले यह समझते हैं कि मुझे छोड़ मेरे बंदों को अपनी बिगड़ी बनाने वाला बना लेंगे? (यह केवल भ्रम है)। ऐसे नकारने वालों के आतिथ्य के लिए हमने नरक को तैयार कर रखा है।
इनसे कहो, क्या तुम्हें पता है कि अपने कर्मों के अनुसार सबसे अधिक घाटे में कौन हैं? वे लोग जिनका सारा परिश्रम दुनिया के जीवन में व्यर्थ चला गया और वे यही समझते रहे कि वे बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। यही लोग हैं जिन्होंने अपने प्रभु की आयतों और उससे मिलने को नकार दिया। अतः उनके कर्म बर्बाद हुए। अब क़यामत के दिन हम उनको कोई महत्त्व नहीं देंगे। उनका बदला यही नरक है, इसलिए कि उन्होंने नकार दिया और मेरी आयतों और मेरे रसूलों का मज़ाक़ उड़ाया है।
अपितु जो मान गए और उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं, उनके लिए स्वर्ग के बाग़ों का आतिथ्य है। वे उसमें सदा रहेंगे, वहां से कभी उठना नहीं चाहेंगे।
(ये निशानियाँ मांगते हैं)। इन्हें बताओ, (हे पैग़ंबर) कि मेरे प्रभु की निशानियों को लिखने के लिए यदि समुद्र स्याही बन जाए तो समुद्र समाप्त हो जाए, इससे पहले कि मेरे प्रभु की निशानियाँ समाप्त हों, यद्यपि हम उसके साथ उसी के समान और भी समुद्र मिला दें।
इनसे कहो, (तुम किससे निशानियाँ मांगते हो)? मैं भी तुम्हारे ही जैसा एक मनुष्य हूं। मुझपर वह्य आती है कि तुम्हारा उपास्य केवल एक ही उपास्य है। अतः जिसे अपने प्रभु से मिलने की आशा हो, उसे चाहिए कि अच्छा कर्म करे और अपने प्रभु की पूजा-उपासना में किसी को सहभागी न बनाए।