सूरह 16

अन्-नह्ल

मक्की · 128 आयतें · 52 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। इनका आपसी संबंध संक्षेप और विस्तार का है। पहली सूरह में जो बातें संक्षेप में या संकेतों के रूप में हैं, दूसरी में उन्हें बिलकुल स्पष्ट किया गया है। यहूदियों से विस्तृत संबोधन, नैतिकता के गुणों और अवगुणों की व्याख्या, और पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के लिए तैयारी का निर्देश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

दोनों सूरतों का मूलभाव सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है, जो पिछली सूरतों से चलता आ रहा है, और दोनों में मूल रूप से संबोधन क़ुरैश क़बीले से है। अपितु, दूसरी सूरह — बनी इस्राईल — में, यहूदियों को भी विस्तारपूर्वक संबोधित किया गया है। इसका कारण यह है कि अब क़ुरैश के समर्थन और पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के विरोध में यहूदी भी खुलकर सामने आ गए थे। इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये सूरतें पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के 'इत्माम-ए-हुज्जत' के चरण में उस समय अवतरित हुई हैं, जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) का समय क़रीब आ गया है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

أَتَىٰٓ أَمْرُ ٱللَّهِ فَلَا تَسْتَعْجِلُوهُ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿1﴾ يُنَزِّلُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ بِٱلرُّوحِ مِنْ أَمْرِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦٓ أَنْ أَنذِرُوٓا۟ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱتَّقُونِ ﴿2﴾ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ تَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿3﴾ خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِن نُّطْفَةٍ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌ مُّبِينٌ ﴿4﴾ وَٱلْأَنْعَـٰمَ خَلَقَهَا ۗ لَكُمْ فِيهَا دِفْءٌ وَمَنَـٰفِعُ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ ﴿5﴾ وَلَكُمْ فِيهَا جَمَالٌ حِينَ تُرِيحُونَ وَحِينَ تَسْرَحُونَ ﴿6﴾ وَتَحْمِلُ أَثْقَالَكُمْ إِلَىٰ بَلَدٍ لَّمْ تَكُونُوا۟ بَـٰلِغِيهِ إِلَّا بِشِقِّ ٱلْأَنفُسِ ۚ إِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ ﴿7﴾ وَٱلْخَيْلَ وَٱلْبِغَالَ وَٱلْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةً ۚ وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿8﴾ وَعَلَى ٱللَّهِ قَصْدُ ٱلسَّبِيلِ وَمِنْهَا جَآئِرٌ ۚ وَلَوْ شَآءَ لَهَدَىٰكُمْ أَجْمَعِينَ ﴿9﴾

परमेश्वर का निर्णय जारी हो चुका है, तो उसके लिए जल्दी न मचाओ। वह दोषरहित और ऊँचा है उन चीज़ों से जिन्हें ये उसका सहभागी बनाते हैं। (इन्हें बताओ, हे पैग़ंबर कि हर व्यक्ति इसके योग्य नहीं होता कि परमेश्वर उस पर फ़रिश्ते उतार दे)। वह अपने भक्तों में से जिस पर चाहता है, अपने आदेश की वह्य के साथ फ़रिश्ते उतारता है, इस निर्देश के साथ कि लोगों को सचेत कर दो कि मेरे सिवा (तुम्हारा) कोई उपास्य नहीं है, इसलिए मुझी से डरो। उसने समस्त आकाशों और धरती की रचना एक उद्देश्य के साथ की है। (उसके निर्णयों पर कोई प्रभावी नहीं हो सकता), वह ऊँचा है उन चीज़ों से जिन्हें ये उसका सहभागी बनाते हैं। उसने मनुष्य को एक छोटी सी बूंद से पैदा किया तो देखते हो कि अचानक वह एक स्पष्ट विरोधी बन कर उठ खड़ा हुआ है। ये चौपाये भी उसने पैदा किए हैं। इनमें तुम्हारे लिए जाड़े का वस्त्र है और अन्य लाभ भी और इनसे तुम आहार भी प्राप्त करते हो। इनके अंदर तुम्हारे लिए सौंदर्य भी है, जबकि शाम के समय इनको वापस लाते हो और जब सुबह को चरने के लिए छोड़ते हो। ये तुम्हारे भार ऐसे शहरों तक ले जाते हैं, जहाँ तुम बड़ी कठिनाई के साथ ही पहुंच सकते थे। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु बड़ा ही कृपालु, अत्यंत दयालु है। ये घोड़े और खच्चर और गधे भी उसी ने पैदा किए हैं ताकि तुम इन पर सवार हो और ये एक सजावट भी हैं। वह ऐसी चीज़ों की रचना भी करता है जिन्हें तुम नहीं जानते। (उसको पाना चाहते हो तो जान लो कि) परमेश्वर तक सीधा मार्ग पहुंचाता है, जबकि मार्ग टेढ़े भी हैं। और यदि वह चाहता तो तो तुम सबकी उसी एक मार्ग की ओर अगुवाई कर देता।

هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً ۖ لَّكُم مِّنْهُ شَرَابٌ وَمِنْهُ شَجَرٌ فِيهِ تُسِيمُونَ ﴿10﴾ يُنۢبِتُ لَكُم بِهِ ٱلزَّرْعَ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلنَّخِيلَ وَٱلْأَعْنَـٰبَ وَمِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ ﴿11﴾ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ وَٱلنُّجُومُ مُسَخَّرَٰتٌۢ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ ﴿12﴾ وَمَا ذَرَأَ لَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُخْتَلِفًا أَلْوَٰنُهُۥٓ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ ﴿13﴾

वही है जिसने आकाश से पानी उतारा जिससे तुम पीते भी हो और उसी से वे वनस्पतियाँ भी उगती हैं जिनमें तुम चौपायों को चराते हो। वह तुम्हारे लिए उसी से खेती और ज़ैतून और खजूर और अंगूर और सब प्रकार के फल उगाता है। निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए बहुत बड़ी निशानी है जो विचार करें। रात और दिन और सूरज और चाँद को तो उसी ने तुम्हारे काम में लगा रखा है और उसी के आदेश से तारे भी तुम्हारे काम में लगे हुए हैं। निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए बहुत निशानियाँ है जो बुद्धि से काम लें। और ये जो विभिन्न रंगों की चीज़ें उसने तुम्हारे लिए धरती में बिखेर दी हैं, उनमें भी निस्संदेह बहुत बड़ी निशानी है उन लोगों के लिए जो स्मरण प्राप्त करें।

وَهُوَ ٱلَّذِى سَخَّرَ ٱلْبَحْرَ لِتَأْكُلُوا۟ مِنْهُ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُوا۟ مِنْهُ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَا وَتَرَى ٱلْفُلْكَ مَوَاخِرَ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿14﴾

वही है जिसने समुद्र को तुम्हारे काम में लगा रखा है, ताकि तुम उससे (मछलियों का) ताज़ा मांस खाओ और उससे सजावट (की वे चीज़ें) निकालो जिन्हें तुम पहना करते हो। और तुम नौकाओं को देखते हो कि इसी (समुद्र) में (उसकी छाती) चीरती हुई चली जा रही हैं, इसलिए कि तुम उनमें यात्रा करो और इसलिए कि अपने प्रभु की कृपा ढूंढो और इसलिए कि उसका आभार व्यक्त करो।

وَأَلْقَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ رَوَٰسِىَ أَن تَمِيدَ بِكُمْ وَأَنْهَـٰرًا وَسُبُلًا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿15﴾ وَعَلَـٰمَـٰتٍ ۚ وَبِٱلنَّجْمِ هُمْ يَهْتَدُونَ ﴿16﴾

उसी ने धरती में पर्वत डाल दिए हैं, ताकि वह तुम को लेकर झुक न पड़े और उसमें नहरें चला दी हैं और मार्ग निकाल दिए हैं,ताकि मार्ग पाओ। और इनके अतिरिक्त अन्य निशान भी बनाए हैं और लोग (आकाश के) तारों से भी मार्ग पाते हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह संभवतः वही बात है जिसे आधुनिक विज्ञान में 'isostasy' (भूसंतुलन) कहा जाता है। ↩
أَفَمَن يَخْلُقُ كَمَن لَّا يَخْلُقُ ۗ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿17﴾ وَإِن تَعُدُّوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ لَا تُحْصُوهَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿18﴾ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَ ﴿19﴾ وَٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْـًٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ ﴿20﴾ أَمْوَٰتٌ غَيْرُ أَحْيَآءٍ ۖ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ ﴿21﴾

फिर क्या जो पैदा करता है, वह उनके बराबर हो जाएगा जो कुछ पैदा नहीं करते? तो क्या तुम समझते नहीं हो? यदि तुम परमेश्वर के वरदानों को गिनना चाहो तो उन्हें गिन नहीं सकोगे। (इस पर भी अकृतज्ञता करते हो)? सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ा ही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। (उसने तुम्हें छूट दे रखी है तो उसका कारण यही है, परंतु याद रखो कि) परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम छिपाते और जो कुछ व्यक्त करते हो। परमेश्वर को छोड़ जिन्हें ये पुकारते हैं, वे कुछ पैदा नहीं करते, अपितु स्वयं पैदा किए हुए हैं। जीवित नहीं हैं मृत हैं और नहीं जानते कि कब उठाए जाएँगे।

إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ ۚ فَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ قُلُوبُهُم مُّنكِرَةٌ وَهُم مُّسْتَكْبِرُونَ ﴿22﴾ لَا جَرَمَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُسْتَكْبِرِينَ ﴿23﴾

तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है। परंतु जो परलोक पर विश्वास नहीं रखते, उनके दिल नकारने वाले हैं और वे घमंड में पड़े हुए हैं। परमेश्वर अवश्य जानता है जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ व्यक्त करते हैं। वह उन लोगों से कदापि प्रेम नहीं करता जो इस प्रकार अहंकार में ग्रस्त हैं।

وَإِذَا قِيلَ لَهُم مَّاذَآ أَنزَلَ رَبُّكُمْ ۙ قَالُوٓا۟ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿24﴾ لِيَحْمِلُوٓا۟ أَوْزَارَهُمْ كَامِلَةً يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۙ وَمِنْ أَوْزَارِ ٱلَّذِينَ يُضِلُّونَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ أَلَا سَآءَ مَا يَزِرُونَ ﴿25﴾

जब उनसे पूछा जाता है कि तुम्हारे प्रभु ने यह क्या चीज़ उतारी है तो कहते हैं कि बीते हुए लोगों की कथाएँ हैं। यह इसलिए कि क़यामत के दिन वे अपने बोझ भी पूरे उठाएं और उन लोगों के कुछ बोझ भी जिन्हें वे बिना किसी ज्ञान के भटका रहे हैं। याद रखो, अत्यंत बुरा है वह बोझ जो ये लोग उठाएंगे।

قَدْ مَكَرَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَأَتَى ٱللَّهُ بُنْيَـٰنَهُم مِّنَ ٱلْقَوَاعِدِ فَخَرَّ عَلَيْهِمُ ٱلسَّقْفُ مِن فَوْقِهِمْ وَأَتَىٰهُمُ ٱلْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ ﴿26﴾ ثُمَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يُخْزِيهِمْ وَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تُشَـٰٓقُّونَ فِيهِمْ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ إِنَّ ٱلْخِزْىَ ٱلْيَوْمَ وَٱلسُّوٓءَ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿27﴾ ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ظَالِمِىٓ أَنفُسِهِمْ ۖ فَأَلْقَوُا۟ ٱلسَّلَمَ مَا كُنَّا نَعْمَلُ مِن سُوٓءٍۭ ۚ بَلَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿28﴾ فَٱدْخُلُوٓا۟ أَبْوَٰبَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ فَلَبِئْسَ مَثْوَى ٱلْمُتَكَبِّرِينَ ﴿29﴾

इन से पहले लोगों ने भी इसी प्रकार चालें चली थीं। फिर उनका ढांचा परमेश्वर ने नीव से उखाड़ दिया तो उसकी छत उनके ऊपर से उनपर गिर गई और उसका दण्ड उनपर वहां से आया, जहाँ से उनकी कल्पना तक न थी। फिर यही नहीं, क़यामत के दिन परमेश्वर उन्हें और भी अपमानित करेगा और उनसे पूछेगा कि मेरे वे भागीदार कहां है जिनके लिए तुम लड़ते रहे थे? जिनको ज्ञान दिया गया था, वे (उस समय) पुकार उठेंगे कि आज इन नकारने वालों के लिए अपमान और दुर्भाग्य है। — उन पर, जिनके प्राण फ़रिश्ते इस हालत में ग्रहण करेंगे कि वे अपने प्राणों पर अत्याचार कर रहे होंगे तो तुरंत मान लेंगे कि हम तो कोई बुरा काम नहीं कर रहे थे। (फ़रिश्ते उत्तर देंगे): क्यों नहीं, निस्संदेह परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ तुम करते रहे हो। अब नरक के दरवाज़ों में प्रवेश हो जाओ, इस प्रकार कि उसी में सदा रहोगे। तो कैसा बुरा ठिकाना है घमंड करने वालों के लिए!

وَقِيلَ لِلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ مَاذَآ أَنزَلَ رَبُّكُمْ ۚ قَالُوا۟ خَيْرًا ۗ لِّلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۚ وَلَدَارُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌ ۚ وَلَنِعْمَ دَارُ ٱلْمُتَّقِينَ ﴿30﴾ جَنَّـٰتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَآءُونَ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْزِى ٱللَّهُ ٱلْمُتَّقِينَ ﴿31﴾ ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ طَيِّبِينَ ۙ يَقُولُونَ سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمُ ٱدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿32﴾

दूसरी ओर जो परमेश्वर से डरने वाले हैं, जब उनसे पूछा जाता है कि तुम्हारे प्रभु ने यह क्या चीज़ उतारी है तो वे कहते हैं कि सबसे अच्छी चीज़ उतारी है। (सत्य यह है कि) जिन्होंने भलाई अपनाई, उनके लिए इस दुनिया में भी भलाई है और परलोक का घर तो इससे कहीं अच्छा है। और कैसा अच्छा है परमेश्वर से डरने वालों का घर! सदा रहने के बाग़ जिनमें वे प्रवेश करेंगे, उनके नीचे नहरें बह रही होंगी, उनके लिए वहां सब कुछ होगा जो वे चाहेंगे। परमेश्वर डरने वालों को इसी प्रकार बदला देगा। उनको, जिनके प्राण फ़रिश्ते इस हालत में ग्रहण करेंगे कि वे विशुद्ध हैं। फ़रिश्ते कहेंगे: तुम पर शांति हो, स्वर्ग में जाकर रहिए अपने कर्मों के बदले में।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह विशेष रूप से इसलिए कहा गया है कि उस समय यह बात पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके साथियों पर पूरी बैठती थी, जिन्हें इस दुनिया में भी विजय और प्रभुत्व मिलना निश्चित था। ↩
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ يَأْتِىَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴿33﴾ فَأَصَابَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا عَمِلُوا۟ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿34﴾

क्या ये इसी की प्रतीक्षा में हैं कि इनके पास फ़रिश्ते आ पहुंचें या तेरे प्रभु का निर्णय प्रकट हो जाए? इनसे पूर्व के लोगों ने भी यही किया था। (फिर जो कुछ हुआ, वह) परमेश्वर ने उनपर कोई अत्याचार नहीं किया, अपितु वही अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे। तो उनके दुष्कर्मों के दण्ड उनको मिले और जिस चीज़ का मज़ाक़ उड़ा रहे थे, उसी ने उनको घेर लिया।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍ نَّحْنُ وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى ٱلرُّسُلِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ ﴿35﴾ وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِى كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱجْتَنِبُوا۟ ٱلطَّـٰغُوتَ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ هَدَى ٱللَّهُ وَمِنْهُم مَّنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ ٱلضَّلَـٰلَةُ ۚ فَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ ﴿36﴾

ये मुश्रिक कहते हैं कि यदि परमेश्वर चाहता तो हम उसके अतिरिक्त किसी चीज़ की पूजा नहीं करते, न हम न हमारे पूर्वज, और न उसके मार्गदर्शन के बिना किसी चीज़ को निषिद्ध करते। इनसे पूर्व के लोगों ने भी यही आचरण अपनाया था। अतः रसूलों पर तो अत्यंत स्पष्ट रूप से पहुंचा देने ही का दायित्व है। (अतः देख सकते हो कि) हमने प्रत्येक क़ौम में एक रसूल इस आह्वान के साथ भेजा था कि परमेश्वर की भक्ति करो और शैतान से बचो, फिर परमेश्वर ने उनमें से कुछ का मार्गदर्शन किया और उनमें से कुछ ऐसे भी हुए जिन पर पथभ्रष्टता थोप दी गई। अतः धरती में चलो फिरो और देखो कि नकारने वालों का अंत क्या हुआ है?

إِن تَحْرِصْ عَلَىٰ هُدَىٰهُمْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى مَن يُضِلُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ ﴿37﴾

तुम यदि इनके मार्गदर्शन की कामना करते हो तो इससे क्या पा लोगे, (हे पैग़ंबर)? इसलिए कि परमेश्वर उनका मार्गदर्शन नहीं करता जिन्हें वह (अपने नियम अनुसार) भटका देता है और उनका कोई सहायक भी नहीं बन सकता।

وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ ۙ لَا يَبْعَثُ ٱللَّهُ مَن يَمُوتُ ۚ بَلَىٰ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ﴿38﴾ لِيُبَيِّنَ لَهُمُ ٱلَّذِى يَخْتَلِفُونَ فِيهِ وَلِيَعْلَمَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ كَـٰذِبِينَ ﴿39﴾ إِنَّمَا قَوْلُنَا لِشَىْءٍ إِذَآ أَرَدْنَـٰهُ أَن نَّقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ ﴿40﴾

ये परमेश्वर के नाम से कड़ी-कड़ी क़समें खाकर कहते हैं कि जो मर जाता है, परमेश्वर उसको नहीं उठाएगा। क्यों नहीं, यह उसका एक वचन है जिसे वह अवश्य पूरा करेगा, परंतु अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। यह इसलिए होगा कि परमेश्वर इनके सामने उस सच्चाई को खोल दे जिसके बारे में यह मतभेद कर रहे हैं और नकारने वाले जान लें कि वे झूठे थे। (यह हमारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है)। हम जब किसी चीज़ का संकल्प कर लेते हैं तो उसके बारे में हमारा इतना ही कहना होता है कि हम उसको कहते हैं हो जा तो वह हो जाती है।

وَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ فِى ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا۟ لَنُبَوِّئَنَّهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةً ۖ وَلَأَجْرُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿41﴾ ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ ﴿42﴾

(हम क्यों नहीं उठाएंगे)? अपितु जिन लोगों ने परमेश्वर के मार्ग में प्रवास किया है, इसके बाद कि उनपर अत्याचार किए गए, हम उनको दुनिया में भी अवश्य अच्छा ठिकाना देंगे और परलोक का अच्छा फल तो कहीं बढ़कर है। काश, ये नकारने वाले जानते! उन्हीं (प्रवास करने वालों) को देंगे जो दृढ़संकल्प रहे और जो अपने प्रभु ही पर भरोसा रखते हैं।

وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِىٓ إِلَيْهِمْ ۚ فَسْـَٔلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿43﴾ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلزُّبُرِ ۗ وَأَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ ﴿44﴾

(इनका बार-बार कहना है कि इनके लिए फ़रिश्ते भेजे जाएं)। सत्य यह है कि तुम से पूर्व भी हमने मनुष्यों ही को रसूल बनाकर भेजा था, जिनकी ओर हम वह्य करते रहे। अतः यदि तुम लोग नहीं जानते तो उनसे पूछ लो जो (इससे पहले) धर्मोपदेश प्राप्त करने वाले हैं। हमने उनको प्रमाणों के साथ और ग्रंथ देकर भेजा था और अब यह धर्मोपदेश हमने तुम्हारी ओर उतारा है, ताकि तुम इन लोगों के लिए उस चीज़ का वर्णन कर दो जो इनकी ओर उतारी गया है और ताकि ये विचार करें।

أَفَأَمِنَ ٱلَّذِينَ مَكَرُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَخْسِفَ ٱللَّهُ بِهِمُ ٱلْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ ٱلْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ ﴿45﴾ أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِى تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ ﴿46﴾ أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ ﴿47﴾

फिर क्या ये लोग जो बुरी योजनाएं कर रहे हैं, इस बात से निडर हो गए हैं कि परमेश्वर इनको धरती में धंसा दे या इन पर वहां से दण्ड आ जाए, जहाँ से इन्हें कल्पना भी न हो। या इनको चलते फिरते पकड़ ले — (वह ऐसा करने पर आ जाए) तो ये उसको विवश नहीं कर सकते। — या इनको ऐसी हालत में पकड़ ले कि ये (स्वयं भी उसके) भय का अनुभव कर रहे हों? वह उन्हें ढील दे रहा है, इसलिए कि तुम्हारा प्रभु बड़ा ही विनीत है, उसकी कृपा शाश्वत है।

أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَىٰ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ مِن شَىْءٍ يَتَفَيَّؤُا۟ ظِلَـٰلُهُۥ عَنِ ٱلْيَمِينِ وَٱلشَّمَآئِلِ سُجَّدًا لِّلَّهِ وَهُمْ دَٰخِرُونَ ﴿48﴾ وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ مِن دَآبَّةٍ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ﴿49﴾ يَخَافُونَ رَبَّهُم مِّن فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ۩ ﴿50﴾

परमेश्वर ने जो चीज़ भी पैदा की है, क्या ये उसको नहीं देखते कि उसकी परछाइयां परमेश्वर को सज्दा करती हुई दाएँ और बाएँ से पलटती हैं और (जिनकी ये परछाइयां हैं), उनपर विनयशीलता छा जाती है? सत्य यह है कि धरती और समस्त आकाशों में जितने जीव जंतु हैं, वे सब परमेश्वर ही को सज्दा करते हैं और परमेश्वर के फ़रिश्ते भी, वे कभी अवज्ञा नहीं करते। वे अपने ऊपर अपने प्रभु से डरते हैं और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है।

وَقَالَ ٱللَّهُ لَا تَتَّخِذُوٓا۟ إِلَـٰهَيْنِ ٱثْنَيْنِ ۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ ۖ فَإِيَّـٰىَ فَٱرْهَبُونِ ﴿51﴾ وَلَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلَهُ ٱلدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ ٱللَّهِ تَتَّقُونَ ﴿52﴾

परमेश्वर ने कहा है कि दो उपास्य न बनाओ, वह एक ही उपास्य है, इसलिए मुझी से डरो। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसी का है और उसी की आज्ञाकारिता सदैव अनिवार्य है। फिर क्या परमेश्वर के अतिरिक्त औरों से डरते हो?

وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ ٱللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ ٱلضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْـَٔرُونَ ﴿53﴾ ثُمَّ إِذَا كَشَفَ ٱلضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ ﴿54﴾ لِيَكْفُرُوا۟ بِمَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا۟ ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴿55﴾ وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِّمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ ۗ تَٱللَّهِ لَتُسْـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ ﴿56﴾

तुम्हें जो सुख भी मिला हुआ है, परमेश्वर ही की ओर से है। फिर जब कोई कष्ट तुमको पहुंचता है तो गुहार भी उसी से करते हो। फिर जब परमेश्वर वह कष्ट तुमसे दूर कर देता है तो उसी समय तुम में से कुछ लोग अपने प्रभु के सहभागी बनाने लगते हैं जिससे कि जो सुख हमने उन लोगों को दिए हैं, उनकी कृतघ्नता करें। अतः कुछ दिन ऐश कर लो, फिर शीघ्र ही तुम जान लोगे। और जिनके बारे में इन्हें कोई ज्ञान नहीं है, ये उनका हिस्सा भी उन चीज़ों में लगाते हैं जो हमने इन्हें प्रदान की हैं। परमेश्वर की सौगंध, जो झूठी बात तुम बना रहे हो, उसके बारे में तुमसे अवश्य पूछताछ होनी है।

وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ ٱلْبَنَـٰتِ سُبْحَـٰنَهُۥ ۙ وَلَهُم مَّا يَشْتَهُونَ ﴿57﴾ وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِٱلْأُنثَىٰ ظَلَّ وَجْهُهُۥ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ ﴿58﴾ يَتَوَٰرَىٰ مِنَ ٱلْقَوْمِ مِن سُوٓءِ مَا بُشِّرَ بِهِۦٓ ۚ أَيُمْسِكُهُۥ عَلَىٰ هُونٍ أَمْ يَدُسُّهُۥ فِى ٱلتُّرَابِ ۗ أَلَا سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ ﴿59﴾ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ مَثَلُ ٱلسَّوْءِ ۖ وَلِلَّهِ ٱلْمَثَلُ ٱلْأَعْلَىٰ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿60﴾

यह परमेश्वर के लिए बेटियां बनाते हैं। वह दोषरहित है; परमेश्वर के लिए बेटियां और इनके लिए जो ये चाहें। जब इनमें से किसी को बेटी की शुभ सूचना दी जाए तो उसके चेहरे पर अंधेरा छा जाए, वह जी में घुटता रहे। उसकी शर्म के मारे जिसकी शुभ सूचना दी गई, लोगों से छिपता फिरे, सोचे कि उसको अपमान के साथ रख छोड़े या उसको मिट्टी में दबा दे — सुनो, कैसा बुरा निर्णय है जो ये करते हैं। (सत्य यह है कि) बुरे उदाहरण के योग्य तो वे लोग हैं जो परलोक को नहीं मानते। परमेश्वर के लिए तो सबसे श्रेष्ठ उदाहरण हैं। वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

وَلَوْ يُؤَاخِذُ ٱللَّهُ ٱلنَّاسَ بِظُلْمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيْهَا مِن دَآبَّةٍ وَلَـٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَـْٔخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ ﴿61﴾

यदि परमेश्वर लोगों के अत्याचार पर तुरंत उन्हें पकड़ लेता तो धरती पर किसी जीव जंतु को नहीं छोड़ता, परंतु (उसका नियम है कि) वह एक निश्चित समय तक उन्हें ढील देता है। फिर जब उनका वह निश्चित समय आ जाएगा तो वे न एक घड़ी पीछे हट सकेंगे और न आगे बढ़ सकेंगे।

وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ ٱلْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ ٱلْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ ٱلنَّارَ وَأَنَّهُم مُّفْرَطُونَ ﴿62﴾

यह परमेश्वर के लिए वे चीज़ें सुझा रहे हैं जो स्वयं अपने लिए पसंद नहीं करते और इनकी ज़बानें झूठ कहती हैं कि इनके लिए (आगे भी) भलाई है। इनके लिए अवश्य नरक है और ये उसी में पड़े छोड़ दिए जाएँगे।

تَٱللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٍ مِّن قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ ٱلْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿63﴾

परमेश्वर की सौगंध, (हे पैग़ंबर), हमने तुमसे पहले भी बहुत सी क़ौमों की ओर रसूल भेजे थे तो शैतान ने उनके कर्म भी (इसी प्रकार) उन्हें अच्छे करके दिखा दिए। अतः अब वही उनका साथी है और उनके लिए एक कष्टदायक यातना है।

وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ ٱلَّذِى ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۙ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿64﴾

(ये नहीं मानते तो इसका कोई दायित्व तुम पर नहीं है)। हमने यह ग्रंथ केवल इसलिए तुम पर उतारा है कि इसके माध्यम से तुम वह चीज़ इनके लिए अच्छे से स्पष्ट कर दो जिसमें ये मतभेद कर रहे हैं और इसलिए कि यह उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और कृपा हो जो इसको मान लें।

وَٱللَّهُ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَآ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَسْمَعُونَ ﴿65﴾ وَإِنَّ لَكُمْ فِى ٱلْأَنْعَـٰمِ لَعِبْرَةً ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِى بُطُونِهِۦ مِنۢ بَيْنِ فَرْثٍ وَدَمٍ لَّبَنًا خَالِصًا سَآئِغًا لِّلشَّـٰرِبِينَ ﴿66﴾ وَمِن ثَمَرَٰتِ ٱلنَّخِيلِ وَٱلْأَعْنَـٰبِ تَتَّخِذُونَ مِنْهُ سَكَرًا وَرِزْقًا حَسَنًا ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ ﴿67﴾

सत्य यह है कि परमेश्वर ही ने आकाश से पानी बरसाया। फिर उससे धरती को उसके मुर्दा हो जाने के बाद पुनः जीवित कर दिया। इसमें निस्संदेह उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो सुनते हैं। और निस्संदेह तुम्हारे लिए चौपायों में भी अवश्य बड़ी शिक्षा-सामग्री है। हम उनके पेटों के अंदर के गोबर और रक्त के बीच से तुमको विशुद्ध दूध पिलाते हैं जो पीने वालों के लिए अत्यंत सुखद है। इसी प्रकार खजूर और अंगूर के फलों से भी। तुम उनसे नशे की चीज़ें भी बनाते हो और खाने की अच्छी चीज़ें भी। इसमें अवश्य उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बुद्धि से काम लेते हैं।

وَأَوْحَىٰ رَبُّكَ إِلَى ٱلنَّحْلِ أَنِ ٱتَّخِذِى مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًا وَمِنَ ٱلشَّجَرِ وَمِمَّا يَعْرِشُونَ ﴿68﴾ ثُمَّ كُلِى مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ فَٱسْلُكِى سُبُلَ رَبِّكِ ذُلُلًا ۚ يَخْرُجُ مِنۢ بُطُونِهَا شَرَابٌ مُّخْتَلِفٌ أَلْوَٰنُهُۥ فِيهِ شِفَآءٌ لِّلنَّاسِ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ ﴿69﴾

(तुम देखते नहीं हो कि), तुम्हारे प्रभु ने मधुमक्खी पर वह्य की कि पर्वतों और पेड़ों में और लोग जो ऊंची-ऊंची जालियां बना लेते हैं उनमें छत्ते बना, फिर हर प्रकार के फलों से रस चूस और अपने प्रभु के सपाट किए हुए मार्गों पर चलती रह। उसके पेट से एक पीने योग्य पदार्थ निकलता है जिसके रंग अनेक होते हैं, उसमें लोगों के लिए उपचार है। इसके अंदर भी निस्संदेह उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो विचार करते हैं।

وَٱللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ فِى ٱلرِّزْقِ ۚ فَمَا ٱلَّذِينَ فُضِّلُوا۟ بِرَآدِّى رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَآءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ ﴿71﴾

इसी प्रकार परमेश्वर ने तुमको पैदा किया है, फिर वही तुमको मृत्यु देता है। (तुम में से कुछ पहले मर जाते हैं) और तुम में से कुछ वृद्धावस्था को पहुंचा दिए जाते हैं, ताकि बहुत कुछ जानने के बाद फिर कुछ न जानें। सत्य यह है कि परमेश्वर ही जानने वाला है, वही प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है।

(फिर ये भी देखो कि) परमेश्वर ने तुम में से कुछ को कुछ पर जीविका में श्रेष्ठता दे रखी है। फिर जिनको श्रेष्ठता दी गई है, वे अपनी जीविका अपने ग़ुलामों को नहीं दे देते कि वे उसमें बराबर हो जाएँ। (परंतु परमेश्वर के बारे में यही समझते हैं कि उसने अपनी ईश्वरत्व दूसरों में बाँट दिया है और ये उन्हीं से पाते हैं)। तो क्या ये परमेश्वर की देन को नकार रहे हैं?

وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًا وَجَعَلَ لَكُم مِّنْ أَزْوَٰجِكُم بَنِينَ وَحَفَدَةً وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ ۚ أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَتِ ٱللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ ﴿72﴾ وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًا مِّنَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ شَيْـًٔا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ ﴿73﴾ فَلَا تَضْرِبُوا۟ لِلَّهِ ٱلْأَمْثَالَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿74﴾

(फिर यह भी देखो कि) परमेश्वर ने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही प्रजाति से पत्नियां बनाईं और तुम्हारी पत्नियों से तुम्हारे लिए बेटे और पोते पैदा किए और तुम्हें खाने के निर्मल पदार्थ प्रदान किए। फिर क्या यह (सब कुछ देखते और जानते हुए भी) असत्य को मानते हैं और परमेश्वर की देन को नकारने वाले हो गए हैं। और परमेश्वर को छोड़ उन चीज़ों को पूजते हैं जो न समस्त आकाशों से इनके लिए किसी जीविका पर कोई अधिकार रखती हैं, न पृथ्वी से और न (इस प्रकार के किसी अधिकार की) क्षमता पा सकती हैं? अतः (अपने जैसा समझ कर तुम) परमेश्वर के लिए उदाहरण न दो। सत्य यह है कि (अपने स्वरूप और गुणों को) परमेश्वर जानता है, तुम नहीं जानते हो।

ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا عَبْدًا مَّمْلُوكًا لَّا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍ وَمَن رَّزَقْنَـٰهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًا فَهُوَ يُنفِقُ مِنْهُ سِرًّا وَجَهْرًا ۖ هَلْ يَسْتَوُۥنَ ۚ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿75﴾ وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا رَّجُلَيْنِ أَحَدُهُمَآ أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوْلَىٰهُ أَيْنَمَا يُوَجِّههُّ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ ۖ هَلْ يَسْتَوِى هُوَ وَمَن يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ ۙ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿76﴾

(तुम उदाहरण ही सुनना चाहते हो तो सुनो), परमेश्वर एक ग़ुलाम का उदाहरण देता है जो किसी अन्य के स्वामित्व में है, वह किसी चीज़ पर अधिकार नहीं रखता। उसके विरुद्ध दूसरा एक व्यक्ति है जिसको हमने अपनी ओर से अच्छी जीविका प्रदान कर रखी है, फिर वह उसमें से खुलकर और छिपकर, (जिस प्रकार चाहता है), ख़र्च करता है। (बताओ), क्या दोनों समान होंगे? (फिर परमेश्वर और उसके असमर्थ सेवकों को किस प्रकार समान कर देते हो? सत्य यह है कि) आभार के योग्य परमेश्वर है, परंतु इनके अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। परमेश्वर (इसी वास्तविकता की व्याख्या के लिए) एक और उदाहरण देता है। दो व्यक्ति हैं, उनमें से एक गूंगा है, कोई कार्य नहीं कर सकता और अपने मालिक पर बोझ बना हुआ है। वह उसको जहाँ भेजता है, वह कोई चीज़ ठीक कर के नहीं लाता। क्या यह गूंगा और वह अधिकार रखने वाला व्यक्ति बराबर होंगे जो न्याय की शिक्षा देता है और स्वयं भी सीधे मार्ग पर बना हुआ है?

وَلِلَّهِ غَيْبُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَآ أَمْرُ ٱلسَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ ٱلْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿77﴾

(ये बार-बार कहते हैं कि क़यामत आनी है तो उसकी घड़ी बता दी जाए। सत्य यह है कि) धरती और समस्त आकाशों का सारा परोक्ष परमेश्वर ही के अधिकार में है और क़यामत का मामला तो इतना ही है, जैसे आँख झपक जाए या उससे भी पहले। (यह उस के लिए कुछ कठिन नहीं है), इसलिए कि पमरेश्वर प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है।

وَٱللَّهُ أَخْرَجَكُم مِّنۢ بُطُونِ أُمَّهَـٰتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْـًٔا وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۙ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿78﴾

और (देखो), तुम्हें परमेश्वर ने तुम्हारी माताओं के पेट से निकाला, उस समय तुम कुछ नहीं जानते थे। उसने तुम्हें कान और आँखें और (सोचने वाले) दिल दिए, ताकि तुम आभार व्यक्त करो।

أَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلطَّيْرِ مُسَخَّرَٰتٍ فِى جَوِّ ٱلسَّمَآءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا ٱللَّهُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿79﴾ وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنۢ بُيُوتِكُمْ سَكَنًا وَجَعَلَ لَكُم مِّن جُلُودِ ٱلْأَنْعَـٰمِ بُيُوتًا تَسْتَخِفُّونَهَا يَوْمَ ظَعْنِكُمْ وَيَوْمَ إِقَامَتِكُمْ ۙ وَمِنْ أَصْوَافِهَا وَأَوْبَارِهَا وَأَشْعَارِهَآ أَثَـٰثًا وَمَتَـٰعًا إِلَىٰ حِينٍ ﴿80﴾

क्या इन्होंने पक्षियों को नहीं देखा कि खुले आकाश में नियमबद्ध बने हुए हैं? उन्हें केवल परमेश्वर थामे हुए है। निस्संदेह इस में उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो मानना चाहें। (वायुमण्डल में उड़ते हुए इन पक्षियों के समान) तुम्हारे लिए तुम्हारे घरों का चैन भी परमेश्वर ही ने पैदा किया है। उसी ने तुम्हारे लिए चौपायों की खाल के घर बनाए हैं जिन्हें तुम अपनी गमन और रुकने के समय अत्यंत हल्का पाते हो। और उनके ऊन और उनके लोम और उनके बालों से (तुम्हारे लिए) घरों का सामान और बहुत सी उपयोगी चीज़ें बनाई हैं जिनसे एक समय तक लाभ उठाते हो।

وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّمَّا خَلَقَ ظِلَـٰلًا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلْجِبَالِ أَكْنَـٰنًا وَجَعَلَ لَكُمْ سَرَٰبِيلَ تَقِيكُمُ ٱلْحَرَّ وَسَرَٰبِيلَ تَقِيكُم بَأْسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُتِمُّ نِعْمَتَهُۥ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْلِمُونَ ﴿81﴾

और परमेश्वर ही ने तुम्हारे लिए अपनी पैदा की हुई चीज़ों की परछाइयाँ बनाई हैं और पर्वतों में तुम्हारे लिए शरणस्थल बनाए हैं और तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाए हैं जो तुमको (तुम्हारे देश की) गर्मी से बचाते हैं और ऐसे वस्त्र बनाए हैं जो तुम्हारी एक दूसरे के साथ लड़ाई में तुम्हारी रक्षा करते हैं। इसी प्रकार परमेश्वर तुम पर अपने उपकार पूरे करता है ताकि उसके आज्ञाकारी बनो।

فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ ﴿82﴾ يَعْرِفُونَ نِعْمَتَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُنكِرُونَهَا وَأَكْثَرُهُمُ ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿83﴾

इतने पर भी ये लोग यदि मुँह मोड़ते हैं तो, (हे पैग़ंबर), तुम्हारा कर्तव्य केवल स्पष्ट रूप से [संदेश] पहुंचा देना है। (इसका परिणाम ये स्वयं भुगतेंगे, इसलिए कि) ये (वे लोग हैं जो) परमेश्वर के उपकारों को पहचानते हैं, फिर उनसे अनजान बन जाते हैं। सत्य यह है कि इनमें अधिकांश अकृतज्ञ हैं।

وَيَوْمَ نَبْعَثُ مِن كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا ثُمَّ لَا يُؤْذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ ﴿84﴾ وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ﴿85﴾ وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ شُرَكَآءَهُمْ قَالُوا۟ رَبَّنَا هَـٰٓؤُلَآءِ شُرَكَآؤُنَا ٱلَّذِينَ كُنَّا نَدْعُوا۟ مِن دُونِكَ ۖ فَأَلْقَوْا۟ إِلَيْهِمُ ٱلْقَوْلَ إِنَّكُمْ لَكَـٰذِبُونَ ﴿86﴾ وَأَلْقَوْا۟ إِلَى ٱللَّهِ يَوْمَئِذٍ ٱلسَّلَمَ ۖ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿87﴾ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ زِدْنَـٰهُمْ عَذَابًا فَوْقَ ٱلْعَذَابِ بِمَا كَانُوا۟ يُفْسِدُونَ ﴿88﴾

ये उस दिन को याद रखें, जिस दिन हम प्रत्येक समुदाय में से एक गवाह उठाएंगे। फिर जिन लोगों ने नकारा होगा, उन्हें न कोई बहाना प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाएगी और न उनसे यह कहा जाएगा कि वे परमेश्वर को प्रसन्न कर लें। और जो इस अत्याचार के दोषी हुए, वे जब (एक बार) दण्ड को देख लेंगे तो वह न उनके लिए हलका होगा और न उन्हें ढील दी जाएगी। ये परमेश्वर के सहभागी बनाने वाले (उस दिन), जब अपने बनाए हुए सहभागियों को देखेंगे तो (अपने अपराध का दोष उन्हीं को देते हुए) कहेंगे कि हे हमारे प्रभु, यही हैं हमारे वे सहभागी जिन्हें हम तुझको छोड़ कर पुकारते रहे। इस पर उनके वे उपास्य उनकी बात उन्हीं पर फेंक मारेंगे कि तुम पूरे झूठे हो। उस दिन वे परमेश्वर के आगे हार स्वीकारेंगे और जो झूठ वे गढ़ते रहे थे, वह सब उनसे लुप्त हो जाएगा। (फिर यही नहीं), जिन लोगों ने (स्वयं भी) नकारा और (दूसरों को भी) परमेश्वर के मार्ग से रोकते रहे, उनके इस बिगाड़ के फलस्वरूप हम उनकी यातना पर यातना बढ़ा देंगे।

وَيَوْمَ نَبْعَثُ فِى كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا عَلَيْهِم مِّنْ أَنفُسِهِمْ ۖ وَجِئْنَا بِكَ شَهِيدًا عَلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ تِبْيَـٰنًا لِّكُلِّ شَىْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ ﴿89﴾ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَـٰنِ وَإِيتَآئِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ وَٱلْبَغْىِ ۚ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿90﴾

ये उस दिन को याद रखें, जिस दिन हम प्रत्येक समुदाय में एक गवाह स्वयं उन्हीं के अंदर से उनपर उठाएंगे और तुम्हें, (हे पैग़ंबर, तुम्हारी क़ौम के) इन लोगों पर गवाही के लिए ला कर खड़ा करेंगे। (इससे पहले) यह ग्रंथ हमने हर चीज़ को स्पष्ट कर देने के लिए तुम पर उतार दिया है, मार्गदर्शन और कृपा के रूप में और आज्ञाकारियों को शुभ सूचना देने के लिए। निस्संदेह, परमेश्वर (इसमें) न्याय और भलाई और नातेदारों को देते रहने का उपदेश करता है और निर्लज्जता, बुराई और मर्यादा उल्लंघन से रोकता है। वह तुम्हें उपदेश करता है ताकि तुम स्मरण प्राप्त करो।

وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِ ٱللَّهِ إِذَا عَـٰهَدتُّمْ وَلَا تَنقُضُوا۟ ٱلْأَيْمَـٰنَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ ٱللَّهَ عَلَيْكُمْ كَفِيلًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ ﴿91﴾ وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّتِى نَقَضَتْ غَزْلَهَا مِنۢ بَعْدِ قُوَّةٍ أَنكَـٰثًا تَتَّخِذُونَ أَيْمَـٰنَكُمْ دَخَلًۢا بَيْنَكُمْ أَن تَكُونَ أُمَّةٌ هِىَ أَرْبَىٰ مِنْ أُمَّةٍ ۚ إِنَّمَا يَبْلُوكُمُ ٱللَّهُ بِهِۦ ۚ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ مَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ ﴿92﴾

तुम भी, (हे अहल-ए-किताब), परमेश्वर के साथ (अपनी) प्रतिज्ञा को पूरा करो, जबकि तुम उसे बांध चुके हो और अपनी क़समें उनके पक्का कर लेने के बाद मत तोड़ो, जबकि तुम परमेश्वर को अपने ऊपर साक्षी बना चुके हो। निस्संदेह, परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम करते हो। तुम उस स्त्री के जैसे न हो जाओ जिसने अपना सूत दृढ़तापूर्वक काता, फिर स्वयं ही उसका हर धागा उधेड़ कर रख दिया। तुम अपनी क़समों को इस डर से आपस में धोखे का साधन बनाते हो कि एक समुदाय कहीं दूसरे समुदाय से आगे न बढ़ जाए। परमेश्वर तो (अपने) इस (निर्णय) के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा कर रहा है। क़यामत के दिन वह अवश्य उस चीज़ को तुम पर अच्छे से स्पष्ट कर देगा जिसमें मतभेद कर रहे हो।1

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  1. अर्थात पैग़ंबर मूसा (अ.) ने परमेश्वर के विधान और बनी इस्माईल में उत्पन्न होने वाले ग़ैर-यहूदी पैग़ंबर (उम्मी नबी) की सहायता और समर्थन की जो प्रतिज्ञा (covenant) तुमसे ली थी, उसको पूरा करो। ↩
وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَٰحِدَةً وَلَـٰكِن يُضِلُّ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَلَتُسْـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿93﴾

यदि परमेश्वर चाहता तो तुम सबको एक ही समुदाय बना देता, परंतु (उसने तुम्हें स्वतंत्रता दी है, इसलिए अब) वह जिसको चाहता है, उसके दुरुपयोग के कारण) भटका देता है और जिसका चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है। और उसने तुम्हारे ऊपर सत्य को पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिया है तो) जो कुछ तुम कर रहे हो, उसके बारे में तुमसे अवश्य पूछा भी जाएगा।

وَلَا تَتَّخِذُوٓا۟ أَيْمَـٰنَكُمْ دَخَلًۢا بَيْنَكُمْ فَتَزِلَّ قَدَمٌۢ بَعْدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُوا۟ ٱلسُّوٓءَ بِمَا صَدَدتُّمْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ وَلَكُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿94﴾ وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِعَهْدِ ٱللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ إِنَّمَا عِندَ ٱللَّهِ هُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿95﴾

तुम अपनी क़समों को आपस में धोखा देने का साधन न बनाओ, कहीं ऐसा न हो कि कोई पाँव जमने के बाद उखड़ जाए और तुम्हें इस अपराध के परिणामस्वरुप कि तुमने (लोगों को) परमेश्वर के मार्ग से रोका है, दण्ड का स्वाद चखना पड़े और (परलोक में) तुम्हें एक बड़ी यातना को भुगतना पड़ जाए। तुम परमेश्वर से की प्रतिज्ञ को थोड़ी धनराशि के बदले न बेचो। (परमेश्वर के दास-जानो), यदि तुम जानो तो जो कुछ परमेश्वर के पास है, वही तुम्हारे लिए अच्छा है।

مَا عِندَكُمْ يَنفَدُ ۖ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ بَاقٍ ۗ وَلَنَجْزِيَنَّ ٱلَّذِينَ صَبَرُوٓا۟ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿96﴾ مَنْ عَمِلَ صَـٰلِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةً طَيِّبَةً ۖ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿97﴾

(याद रखो), जो कुछ तुम्हारे पास है, उसका (एक दिन) अंत हो जाएगा और जो कुछ परमेश्वर के पास है, वह बाक़ी रहने वाला है। (यह कर्मों का फल है) और हम उन लोगों को जो (हमारे मार्ग में) दृढ़संकल्प रहे हैं, उनके कर्मों के बदले में अवश्य उनका सबसे अच्छा फल देंगे। जो व्यक्ति भी कोई अच्छा कर्म करेगा, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, वह यदि ईमान पर है तो हम उसको (इस लोक और परलोक, दोनों में) एक विशुद्ध जीवन व्यतीत कराएंगे और ऐसे लोगों को उनके कर्मों के बदले में अवश्य उनका अच्छा फल देंगे।1

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  1. यह सत्यनिष्ठ लोगों की ओर संकेत है जो उस समय विरोधियों के चक्रव्यूह में तरह-तरह के मानसिक और शारीरिक कष्टों का निशाना बने हुए थे। परमेश्वर ने उनको शुभ समाचार दिया और उनके विरोधियों को सचेत किया है। ↩
فَإِذَا قَرَأْتَ ٱلْقُرْءَانَ فَٱسْتَعِذْ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ ٱلرَّجِيمِ ﴿98﴾ إِنَّهُۥ لَيْسَ لَهُۥ سُلْطَـٰنٌ عَلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ ﴿99﴾ إِنَّمَا سُلْطَـٰنُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُۥ وَٱلَّذِينَ هُم بِهِۦ مُشْرِكُونَ ﴿100﴾

अतः जब (इनके सामने, इन्हें सचेत करने के लिए) तुम क़ुरआन पढ़ो तो (पहले) तिरस्कृत शैतान से परमेश्वर की शरण मांग लिया करो। (वह अवश्य तुम्हारे अंदर भ्रम पैदा करेगा, परंतु याद रखो), उन लोगों पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता जो मान चुके हैं और अपने प्रभु ही पर भरोसा रखते हैं। वह केवल उन्हीं पर प्रभावी होता है जो उससे मित्रता रखते और अपने प्रभु के सहभागी बनाते हैं।

وَإِذَا بَدَّلْنَآ ءَايَةً مَّكَانَ ءَايَةٍ ۙ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مُفْتَرٍۭ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿101﴾ قُلْ نَزَّلَهُۥ رُوحُ ٱلْقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِٱلْحَقِّ لِيُثَبِّتَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ ﴿102﴾

(तुम देखते हो कि) जब हम एक आयत को बदलकर उसके स्थान पर दूसरी आयत उतारते हैं — और परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ उतारता है — तो ये कहते हैं कि (यह इस बात का प्रमाण है कि) तुम तो स्वयं गढ़कर लाते हो। नहीं, अपितु (सत्य यह है कि) इनमें से अधिकांश जानते नहीं हैं कि इसमें क्या प्रज्ञता अपेक्षित होती है। इनसे कह दो, इसे तो रूह-उल-क़ुदुस ने तेरे प्रभु की ओर से सत्य के साथ उतारा है ताकि मानने वालों के पाँव जमाए रखे और उनके लिए यह मार्गदर्शन और शुभ सूचना हो जो (परमेश्वर के) आज्ञाकारी हैं।1

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  1. अर्थात तौरात (Torah) के किसी विधान को पवित्र कुरआन के किसी दूसरे विधान से बदल देते हैं। ↩
وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّهُمْ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُۥ بَشَرٌ ۗ لِّسَانُ ٱلَّذِى يُلْحِدُونَ إِلَيْهِ أَعْجَمِىٌّ وَهَـٰذَا لِسَانٌ عَرَبِىٌّ مُّبِينٌ ﴿103﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ لَا يَهْدِيهِمُ ٱللَّهُ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿104﴾ إِنَّمَا يَفْتَرِى ٱلْكَذِبَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَـٰذِبُونَ ﴿105﴾

हम अच्छे से जानते हैं कि ये तुम्हारे बारे में कहते हैं कि इसे तो एक आदमी सिखाता है। ये जिसकी बात करते हैं, उसकी भाषा तो ग़ैर-अरबी है और यह सुस्पष्ट अरबी भाषा है। सत्य यह है कि जो लोग परमेश्वर की आयतों को नहीं मानते, उन्हें परमेश्वर कभी उचित बात तक पहुँचने का सौभाग्य नहीं देता और (आगे भी) उनके लिए कष्टदायक यातना है। (हमारे पैग़ंबर ने कोई झूठ नहीं गढ़ा, अपितु) झूठ तो वही लोग गढ़ रहे हैं जो परमेश्वर की आयतों को मानते नहीं हैं और वही वस्तुतः झूठे हैं।

مَن كَفَرَ بِٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ إِيمَـٰنِهِۦٓ إِلَّا مَنْ أُكْرِهَ وَقَلْبُهُۥ مُطْمَئِنٌّۢ بِٱلْإِيمَـٰنِ وَلَـٰكِن مَّن شَرَحَ بِٱلْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِّنَ ٱللَّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿106﴾ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمُ ٱسْتَحَبُّوا۟ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا عَلَى ٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿107﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَسَمْعِهِمْ وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْغَـٰفِلُونَ ﴿108﴾ لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿109﴾

(हे मानने वालो, तुम में से) जो मानने के बाद परमेश्वर से कुफ़्र करेंगे, उन्हें यदि विवश किया गया हो और उनका दिल ईमान पर संतुष्ट हो, तब तो कोई पकड़ नहीं, परंतु जो कुफ़्र के लिए सीने खोल देंगे, उनपर परमेश्वर का प्रकोप है और उन्हें अत्यंत कठोर दण्ड होगा। यह इसलिए कि उन्होंने परलोक के विरुद्ध दुनिया के जीवन को प्रिय रखा और इसलिए कि इस प्रकार के नकारने वाले लोगों का मार्गदर्शन परमेश्वर नहीं किया करता। यही लोग हैं जिनके दिलों और कानों और आँखों पर परमेश्वर ने मुहर लगा दी है और यही हैं जो (परलोक से) बेपरवाह हैं। निश्चित रूप से परलोक में यही घाटे में होंगे।

ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا فُتِنُوا۟ ثُمَّ جَـٰهَدُوا۟ وَصَبَرُوٓا۟ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿110﴾ يَوْمَ تَأْتِى كُلُّ نَفْسٍ تُجَـٰدِلُ عَن نَّفْسِهَا وَتُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿111﴾

फिर यह बात भी है कि जिन्होंने प्रवास किया, इसके बाद कि वे उत्पीड़न में डाले गए, फिर (परमेश्वर के मार्ग में) संघर्ष किया और दृढ़संकल्प रहे, इसमें कोई संदेह नहीं कि तेरा प्रभु (उनकी) इन सब बातों के बाद बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। उस दिन, जब हर व्यक्ति अपने बचाव में बोलता हुआ आएगा और हर व्यक्ति को पूरा-पूरा वही बदला मिलेगा जो उसने किया होगा और लोगों के साथ कोई अन्याय नहीं होगा।

وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا قَرْيَةً كَانَتْ ءَامِنَةً مُّطْمَئِنَّةً يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًا مِّن كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ ٱللَّهِ فَأَذَٰقَهَا ٱللَّهُ لِبَاسَ ٱلْجُوعِ وَٱلْخَوْفِ بِمَا كَانُوا۟ يَصْنَعُونَ ﴿112﴾ وَلَقَدْ جَآءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ ٱلْعَذَابُ وَهُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿113﴾

(क़ुरैश के लोगो), परमेश्वर (तुम्हारे लिए) उस बस्ती का उदाहरण प्रस्तुत करता है जो शांति और संतुष्टि का जीवन बिता रही थी। उसकी जीविका उसको हर दिशा से प्रचुरता के साथ पहुँच रही थी। फिर उसने परमेश्वर के उपकारों के प्रति अकृतज्ञता दिखाई, तब परमेश्वर ने उसके वासियों के दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप उसको भूख का स्वाद चखाया और भय का वस्त्र पहना दिया। उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आया था तो उन्होंने उसे झूठा कह दिया। फिर उन्हें दण्ड ने पकड़ लिया और वे अपने प्राणों पर स्वयं अत्याचार करने वाले थे।

فَكُلُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ حَلَـٰلًا طَيِّبًا وَٱشْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ ﴿114﴾ إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ ٱلْمَيْتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحْمَ ٱلْخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ لِغَيْرِ ٱللَّهِ بِهِۦ ۖ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿115﴾ وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُكُمُ ٱلْكَذِبَ هَـٰذَا حَلَـٰلٌ وَهَـٰذَا حَرَامٌ لِّتَفْتَرُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ ﴿116﴾ مَتَـٰعٌ قَلِيلٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿117﴾

अतः (उनके इस अंत से सीख प्राप्त करो और) परमेश्वर ने जो वैध और निर्मल चीज़ें तुम्हें दे रखी हैं, उन्हें खाओ और परमेश्वर के उपकार का आभार व्यक्त करो, यदि तुम उसी की भक्ति करते हो। उसने तो तुम्हारे लिए केवल मृत पशु और खून और सूअर का मांस और परमेश्वर के सिवा किसी अन्य के नाम का ज़बीहा अवैध किया है। इस पर भी जो विवश हो जाए, इस प्रकार कि न चाहने वाला हो, न मर्यादा तोड़ने वाला तो उस पर कोई दोष नहीं, इसलिए कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। तुम अपनी ज़बानों के बनाए हुए झूठ के आधार पर यह न कहो कि यह वैध है और यह अवैध है कि इस प्रकार परमेश्वर पर झूठ मढ़ने लगो। याद रखो, जो लोग परमेश्वर पर झूठ मढ़ेंगे, वे कभी भी सफलता नहीं पाएंगे। यह कुछ दिन की मौज है और (इसके बाद) एक कष्टदायक दण्ड उनकी प्रतीक्षा में है।1

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  1. अर्थात उन वस्तुओं में से वर्जित ठहराया है जिन्हें लोग पवित्र और उत्तम समझ कर खा सकते थे। ↩
وَعَلَى ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ حَرَّمْنَا مَا قَصَصْنَا عَلَيْكَ مِن قَبْلُ ۖ وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴿118﴾

और जो यहूदी हैं, उनके लिए भी हमने वही चीज़ें अवैध की थीं जो (ऊपर) इससे पहले हम तुम्हें बता चुके हैं। (इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह) हमने उनपर कोई अत्याचार नहीं किया, अपितु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते रहे हैं।

ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ عَمِلُوا۟ ٱلسُّوٓءَ بِجَهَـٰلَةٍ ثُمَّ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوٓا۟ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿119﴾

फिर उनके लिए जो भावनाओं में आ कर बुराई कर बैठें, फिर उसके बाद प्रायश्चित करें और अपने आप को सुधारें तो इसके बाद, (हे पैग़ंबर), तेरा प्रभु, इसमें कोई संदेह नहीं कि तेरा प्रभु बड़ा ही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ كَانَ أُمَّةً قَانِتًا لِّلَّهِ حَنِيفًا وَلَمْ يَكُ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿120﴾ شَاكِرًا لِّأَنْعُمِهِ ۚ ٱجْتَبَىٰهُ وَهَدَىٰهُ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿121﴾ وَءَاتَيْنَـٰهُ فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةً ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿122﴾ ثُمَّ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ أَنِ ٱتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿123﴾

(अपने अंधविश्वासों को ये इब्राहीम के साथ न जोड़ें), सत्य यह है कि इब्राहीम (अपने आप में) एक पूरा संघ था, परमेश्वर का आज्ञाकारी और एकाग्र और वह मुश्रिकों में से नहीं था। वह उसके उपकारों का आभार व्यक्त करने वाला था। परमेश्वर ने उसे चुना और उसकी अगुवाई एक सीधे मार्ग की ओर की थी। हमने उसको दुनिया में भी भलाई प्रदान की और निस्संदेह वह परलोक में भी सदाचारियों में से होगा। फिर (यही कारण है कि) हमने तुम्हारी ओर वह्य की कि इसी इब्राहीम के मार्ग का अनुसरण करो, जो एकाग्र था और मुश्रिकों में से नहीं था।

إِنَّمَا جُعِلَ ٱلسَّبْتُ عَلَى ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ﴿124﴾

(सब्त की कठिनाई का भी इब्राहीम से कोई संबंध नहीं है)। यह सब्त तो वास्तव में उन्हीं लोगों पर लागू किया गया था जिन्होंने (व्यर्थ के झगड़े से) इसमें मतभेद पैदा कर लिए। तेरा प्रभु अवश्य क़यामत के दिन उनके बीच उन सब चीज़ों के बारे में निर्णय करेगा जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं।

ٱدْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِٱلْحِكْمَةِ وَٱلْمَوْعِظَةِ ٱلْحَسَنَةِ ۖ وَجَـٰدِلْهُم بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ ﴿125﴾ وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا۟ بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِۦ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِّلصَّـٰبِرِينَ ﴿126﴾ وَٱصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِٱللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِى ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ ﴿127﴾ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوا۟ وَّٱلَّذِينَ هُم مُّحْسِنُونَ ﴿128﴾

तुम, (हे पैग़ंबर), अपने प्रभु के मार्ग की ओर बुलाते रहो प्रज्ञता के साथ और अच्छे उपदेश के साथ, और इनके साथ उस प्रकार से तर्क करो जो दिल को भाने वाला है। निस्संदेह तेरा प्रभु भलीभांति जानता है कि कौन उसके मार्ग से भटका हुआ है और वह उन्हें भी भलीभांति जानता है जो मार्गदर्शन पाने वाले हैं। यदि तुम लोग (किसी समय) बदला लो तो उतना ही बदला लो जितना तुम्हारे साथ किया गया है, परंतु यदि धीरज रखो तो धीरज रखने वालों के लिए यह बहुत ही अच्छा है। (हे पैग़ंबर), धीरज रखो — और तुम्हें यह धैर्य परमेश्वर से जुडने ही से प्राप्त हो सकता है — और तुम इन के लिए दुखी न हो और जो चालें ये चल रहे हैं, उनसे दिल दुखी न हो। निस्संदेह, परमेश्वर उन लोगों के साथ है जिन्होंने संयम अपनाया और जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं।