सूरह 65

अत्-तलाक़्

मदनी · 12 आयतें · 6 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में पत्नियों से अलगाव और दूसरी में उनसे स्नेह और प्रेम के अवसरों पर, एक ईमान वाले व्यक्ति को जिन सीमाओं और मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, उनकी व्याख्या की गई है। दोनों सूरतों में संबोधन मुसलमानों से है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) के चरण में अवतरित हुई हैं।

पहली सूरह—अत्-तलाक़—का विषय मुसलमानों को यह बताना है कि यदि पत्नी से अलगाव की स्थिति आ जाए तो इस मामले में किस प्रकार और कहाँ तक परमेश्वर द्वारा निर्धारित सीमाओं के पालन का प्रबंध होना चाहिए।

दूसरी सूरह—अत्-तहरीम—का विषय उन्हें यह बताना है कि स्नेह और प्रेम के अवसरों पर अपने आप को और अपने परिवार को किस प्रकार परमेश्वर की निर्धारित सीमाओं में रखने का प्रयास करना चाहिए और हर व्यक्ति को कितना सावधान रहना चाहिए कि परमेश्वर के यहां काम आने वाली चीज़ एक व्यक्ति का अपना कर्म है। यदि यह न हो, तो किसी महापुरुष के साथ संबंध भी उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَأَحْصُوا۟ ٱلْعِدَّةَ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ رَبَّكُمْ ۖ لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنۢ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ إِلَّآ أَن يَأْتِينَ بِفَـٰحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۥ ۚ لَا تَدْرِى لَعَلَّ ٱللَّهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذَٰلِكَ أَمْرًا ﴿1﴾

हे नबी, तुम लोग अपनी पत्नियों को तलाक़ दो तो उनकी इद्दत के अनुसार तलाक़ दो, और इद्दत की अवधि ठीक-ठीक गिनो और परमेश्वर से डरते रहो जो तुम्हारा प्रभु है। (इद्दत की अवधि में) न तुम उन्हें उनके घरों से निकालो, न वे स्वयं निकलें, सिवाए इसके कि वे किसी स्पष्ट निर्लज्जता की दोषी हों। ये परमेश्वर की निर्धारित की हुई मर्यादाएं हैं और जो परमेश्वर की मर्यादाओं का उल्लंघन करेंगे, वे याद रखें कि उन्होंने अपने ही प्राण पर अत्याचार किया है। तुम नहीं जानते, हो सकता है परमेश्वर इसके बाद कोई और परिस्थिति पैदा कर दे।

فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ فَارِقُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ وَأَشْهِدُوا۟ ذَوَىْ عَدْلٍ مِّنكُمْ وَأَقِيمُوا۟ ٱلشَّهَـٰدَةَ لِلَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّهُۥ مَخْرَجًا ﴿2﴾ وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ ۚ وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بَـٰلِغُ أَمْرِهِۦ ۚ قَدْ جَعَلَ ٱللَّهُ لِكُلِّ شَىْءٍ قَدْرًا ﴿3﴾

(इसी प्रकार तलाक़ दो), फिर जब वे अपनी इद्दत के अंत पर पहुंच जाएं तो उन्हें भले तरीके से विवाह-बंधन में रखो या भले तरीके से अलग कर दो। और (रिश्ता निभाने की इच्छा हो या जुदाई की, दोनों परिस्थितियों में) दो विश्वसनीय व्यक्तियों को अपने में से गवाह बना लो, और (गवाहों के लिए परमेश्वर का आदेश है कि गवाही देने वालो), तुम इस गवाही को परमेश्वर के लिए स्थापित रखो। यह बात है जिसका उपदेश (तुम में से) उन लोगों को किया जाता है जो परमेश्वर को और क़यामत के दिन को मानते हैं। और जो लोग परमेश्वर से डरेंगे, उन्हें किसी कठिनाई का सामना करना पड़े तो परमेश्वर उनके लिए निकलने का रास्ता पैदा करेगा और उन्हें वहां से जीविका देगा, जहाँ उनकी कल्पना भी न जाती हो। और जो परमेश्वर पर भरोसा करेंगे, वह उन (की सहायता) के लिए पर्याप्त है। निस्संदेह, परमेश्वर अपने संकल्प पूरे करके रहता है। (हाँ, यह अवश्य है कि) परमेश्वर ने हर चीज़ के लिए एक माप निश्चित कर रखा है।

وَٱلَّـٰٓـِٔى يَئِسْنَ مِنَ ٱلْمَحِيضِ مِن نِّسَآئِكُمْ إِنِ ٱرْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلَـٰثَةُ أَشْهُرٍ وَٱلَّـٰٓـِٔى لَمْ يَحِضْنَ ۚ وَأُو۟لَـٰتُ ٱلْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَن يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ ۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّهُۥ مِنْ أَمْرِهِۦ يُسْرًا ﴿4﴾ ذَٰلِكَ أَمْرُ ٱللَّهِ أَنزَلَهُۥٓ إِلَيْكُمْ ۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يُكَفِّرْ عَنْهُ سَيِّـَٔاتِهِۦ وَيُعْظِمْ لَهُۥٓ أَجْرًا ﴿5﴾

तुम्हारी स्त्रियों में से जो मासिक-धर्म से निराश हो चुकी हों, और वे भी जिन्हें (मासिक-धर्म की आयु को पहुंचने पर भी) मासिक-धर्म नहीं आया, उनके बारे में यदि कोई संदेह है तो उनकी इद्दत तीन महीने होगी। और गर्भवती स्त्रियों की इद्दत यह है कि वे गर्भावस्था से निकल जाएँ। (ये परमेश्वर के निर्देश हैं, इनका अनुसरण करो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर से डरेगा, परमेश्वर उसके लिए उसके विषय में सुविधा पैदा कर देगा। यह परमेश्वर का आदेश है जो उसने तुम्हारी ओर उतारा है और जो परमेश्वर से डरेगा, परमेश्वर उसके पापकर्म उससे दूर करेगा और उस (के अच्छे कर्मों) का फल बढ़ा देगा।

أَسْكِنُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ سَكَنتُم مِّن وُجْدِكُمْ وَلَا تُضَآرُّوهُنَّ لِتُضَيِّقُوا۟ عَلَيْهِنَّ ۚ وَإِن كُنَّ أُو۟لَـٰتِ حَمْلٍ فَأَنفِقُوا۟ عَلَيْهِنَّ حَتَّىٰ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ ۚ فَإِنْ أَرْضَعْنَ لَكُمْ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ ۖ وَأْتَمِرُوا۟ بَيْنَكُم بِمَعْرُوفٍ ۖ وَإِن تَعَاسَرْتُمْ فَسَتُرْضِعُ لَهُۥٓ أُخْرَىٰ ﴿6﴾ لِيُنفِقْ ذُو سَعَةٍ مِّن سَعَتِهِۦ ۖ وَمَن قُدِرَ عَلَيْهِ رِزْقُهُۥ فَلْيُنفِقْ مِمَّآ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ۚ لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا مَآ ءَاتَىٰهَا ۚ سَيَجْعَلُ ٱللَّهُ بَعْدَ عُسْرٍ يُسْرًا ﴿7﴾

(इद्दत की अवधि में) इन स्त्रियों को वहीं रखो, जहाँ अपनी हैसियत के अनुसार तुम रहते हो और उनको परेशान करने के लिए सताओ नहीं। और यदि वे गर्भ से हों तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो, जब तक वे गर्भावस्था से निकल न जाएं। फिर यदि वे (तुम्हारे बच्चे को) तुम्हारे लिए दूध पिलाएं तो उनका मुआवज़ा उन्हें दो और यह मामला प्रथा अनुसार आपसी परामर्श से तय कर लो। और यदि तुम्हें कोई असुविधा हो तो बच्चे को कोई दूसरी स्त्री दूध पिला लेगी। (तुम में से) जो समृद्ध हो, वह अपनी हैसियत के अनुसार ख़र्च करे और जिसको नपा तुला ही मिला है, वह उसी में से ख़र्च करे जो परमेश्वर ने उसे दिया है। परमेश्वर ने जिसको जितना दिया है, उससे अधिक का वह उस पर बोझ नहीं डालता। (तुम संतुष्ट रहो), परमेश्वर दरिद्रता के बाद शीघ्र समृद्धि भी प्रदान करेगा।

وَكَأَيِّن مِّن قَرْيَةٍ عَتَتْ عَنْ أَمْرِ رَبِّهَا وَرُسُلِهِۦ فَحَاسَبْنَـٰهَا حِسَابًا شَدِيدًا وَعَذَّبْنَـٰهَا عَذَابًا نُّكْرًا ﴿8﴾ فَذَاقَتْ وَبَالَ أَمْرِهَا وَكَانَ عَـٰقِبَةُ أَمْرِهَا خُسْرًا ﴿9﴾ أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۚ قَدْ أَنزَلَ ٱللَّهُ إِلَيْكُمْ ذِكْرًا ﴿10﴾ رَّسُولًا يَتْلُوا۟ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ مُبَيِّنَـٰتٍ لِّيُخْرِجَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۚ وَمَن يُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ وَيَعْمَلْ صَـٰلِحًا يُدْخِلْهُ جَنَّـٰتٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًا ۖ قَدْ أَحْسَنَ ٱللَّهُ لَهُۥ رِزْقًا ﴿11﴾

(ये परमेश्वर की मर्यादाएं हैं। इनका उल्लंघन करोगे तो याद रखो कि तुमसे पहले) कितनी ही बस्तियां ऐसी हुई है जिन्होंने अपने प्रभु और उसके रसूलों के आदेश की अवज्ञा की तो हमने उनसे कठिन हिसाब लिया और उन्हें बड़ा कठोर दण्ड दिया। सो उन्होंने अपने किए का स्वाद चख लिया और उनका अंत घाटा ही घाटा हुआ। परमेश्वर ने (परलोक में) उनके लिए एक कठोर यातना तैयार कर रखी है। इसलिए परमेश्वर से डरो, बुद्धिजीवियो, जो आस्तिक हुए हो। परमेश्वर ने तुम्हारी ओर एक उपदेश उतार दिया है, एक ऐसा पैग़ंबर जो तुम्हें परमेश्वर की आयतें सुनाता है जो सब चीज़ों को स्पष्ट कर देने वाली हैं ताकि उन लोगों को अँधेरों से निकाल कर प्रकाश में ले आए जो मान चुके और उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं। और जो परमेश्वर को मानें और अच्छे कर्म करें, (उनसे परमेश्वर का वचन है कि) उन्हें वह ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। परमेश्वर ने उनके लिए सबसे अच्छी जीविका का प्रबंध कर रखा है।

ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍ وَمِنَ ٱلْأَرْضِ مِثْلَهُنَّ يَتَنَزَّلُ ٱلْأَمْرُ بَيْنَهُنَّ لِتَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ وَأَنَّ ٱللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَىْءٍ عِلْمًۢا ﴿12﴾

परमेश्वर वही है जिसने सात आकाश बनाए और उनही के समान ज़मीनें भी। उसके निर्देश उनमें उतरते रहते हैं। यह इसलिए बता दिया है कि तुम जान लो कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है और जान लो कि परमेश्वर का ज्ञान सब चीज़ों को घेरे हुए है।