सूरह 111
अल्-लहब्
मक्की · 5 आयतें · 1 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह क़ुरैश क़बीले के धर्मभ्रष्ट नेताओं (अइम्मा-ए-कुफ़्र) के विनाश को दर्शाती है, जबकि दूसरी सूरह पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की ओर से उस मान्यता का निर्णायक उद्घोष है, जिसके नकारने वालों के लिए विनाश की यह भविष्यवाणी की गई है।
पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के आह्वान के परिणामस्वरूप, अरब की भूमि में अनेक देवी-देवताओं की पूजा-उपासना कर परमेश्वर के साझी बनाने (शिर्क) और एकमात्र परमेश्वर की उपासना करने (तौहीद) के बीच जो संघर्ष शुरू हुआ, उसका अनिवार्य परिणाम यही होना था कि शिर्क मिटा दिया जाए और संपूर्ण अरब प्रायद्वीप में तौहीद (एकेश्वरवाद) का आधिपत्य स्थापित हो जाए। ये दोनों सूरतें इसी परिणाम को पूर्ण निश्चय के साथ व्यक्त करती हैं। यदि इस परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत), जानबूझकर इस्लाम को नकारने वालों से अलगाव (बराअत) और विजय व सहायता (फ़त्ह व नुस्रत) की शुभ सूचना का जो विषय सूरह अल्-मा'ऊन और सूरह अल्-कौसर से प्रारंभ हुआ था, वह इन सूरतों में पूरा हो चुका है। इस के साथ, यदि ध्यान दिया जाए, तो क़ुरआन का आह्वान भी अपने चरम को पहुँच चुका है, और सूरह अल्-इख़लास में, जो विषय की दृष्टि से क़ुरआन की अंतिम सूरह है, उसके संदेश के मूल आधार — तौहीद — को उसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने की उद्घोषणा कर दी गई है। यह घोषणा अन्य स्थानों पर भी आई है, किंतु यह संक्षिप्त एवं व्यापक सूरह विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए अवतरित की गई कि विरोधी इसे दिन-रात सुनें और समर्थक इसे याद करके तावीज़ की भाँति अपनी आत्मा का कवच बना लें।
दोनों सूरतों में संबोधन की दिशा क़ुरैश क़बीले की ओर है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में, पैग़ंबर (स.) के धर्मचार के हिज्रत व बराअत के चरण के अंत में अवतरित हुई हैं।
पहली सूरह — अल्-लहब — का विषय क़ुरैश क़बीले में अधर्म के नेताओं, विशेष रूप से अबू लहब, के विनाश की उद्घोषणा है।
दूसरी सूरह — अल्-इख़लास — का विषय तौहीद की उस धारणा का निर्णायक उद्घोष है, जो क़ुरआन के संदेश का केंद्र एवं आधार है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
अबू लहब के हाथ टूट गए और वह स्वयं भी नष्ट हुआ। न उसका धन उसके काम आया और न वह पुण्य जो उसने कमाया। यह (अंगार-मुख) अब भड़कने वाली आग में पड़ेगा और इसके साथ इसकी पत्नी भी। वह नरक में अपने लिए ईंधन ढो रही होगी। उसके गले में मोटी बटी हुई रस्सी होगी।