सूरह 75
अल्-क़ियामह्
मक्की · 40 आयतें · 7 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह हमारे अंदर हमारे झिड़कने वाले व्यक्तित्व (नफ़्स-ए-लव्वामह) के साक्ष्य से क़यामत को प्रमाणित करती है, जबकि दूसरी सूरह में इसी दावे को मानव अस्तित्व में निहित भलाई और बुराई की अंतःप्रेरणा (इल्हाम) से प्रमाणित किया गया है। पहली सूरह में सचेत करने (इंज़ार) का पहलू प्रमुख है, जबकि दूसरी में शुभ-सूचना देने (बशारत) का पहलू अधिक उजागर है। दोनों सूरतों में संबोधन मूल रूप से क़ुरैश क़बीले के नेताओं से है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के सार्वजनिक चेतावनी (इंज़ार-ए-आम) के चरण में अवतरित हुई हैं।
इन दोनों सूरतों का विषय क़यामत को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से क़ुरैश को सचेत करना है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
(ये क़यामत को झूठा कहते हैं)? नहीं, मैं क़यामत के दिन को गवाही में प्रस्तुत करता हूं, और नहीं, मैं (तुम्हारे अंदर तुम्हारे) झिड़कने वाले व्यक्तित्व को गवाही में प्रस्तुत करता हूं। क्या मनुष्य यह समझता है कि हम इसकी हड्डियों को इकट्ठा नहीं कर सकेंगे? क्यों नहीं! हम तो इसके पोर-पोर ठीक कर सकते हैं। (नहीं, यह बात नहीं), अपितु सत्य यह है कि मनुष्य अपने अंतःकरण के सामने शरारत करना चाहता है। पूछता है: क़यामत कब आएगी?
फिर जब आँखें चौंधिया जाएंगी और चाँद ग्रहणग्रस्त होगा और सूरज और चाँद दोनों इकट्ठे कर दिए जाएँगे तो यही मनुष्य उस दिन कहेगा: अब कहाँ भाग कर जाऊँ — कदापि नहीं, अब कहीं शरण नहीं! उस दिन तेरे प्रभु ही के सामने जा ठहरना होगा। उस दिन मनुष्य को बताया जाएगा कि उसने क्या आगे भेजा और क्या पीछे छोड़ा है। अपितु सत्य यह है कि मनुष्य स्वयं अपने ऊपर साक्षी है, यद्यपि वह अपने लिए कितने ही बहाने बनाए।
(इन पर इत्माम-ए-हुज्जत की जल्दी में, हे पैग़ंबर), तुम इस क़ुरआन को शीघ्र पा लेने के लिए अपनी ज़बान को इस पर न चलाओ। (यह इसी प्रकार उतरेगा। तुम संतुष्ट रहो), इसका इकट्ठा करना और सुनाना, सब हमारे ऊपर है। इसलिए जब (उस समय) हम इसको पढ़ें तो इसके उस पठन का अनुसरण करो। फिर हमारे ही ऊपर है कि (यदि कहीं आवश्यकता हो तो) हम (तुम्हारे लिए) इसकी व्याख्या कर दें।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात इसी क्रम के साथ थोड़ा थोड़ा कर के उतरेगा। ↩
(नहीं, तुम इसको नहीं सकते), कदापि नहीं, अपितु सत्य यह है कि तुम इस शीघ्र मिलने वाली से प्रेम करते हो और उसको छोड़े हुए हो जो देर से आने वाली है। (परंतु वह आएगी और इस प्रकार आएगी कि) कितने चेहरे उस दिन ताज़ा होंगे, अपने प्रभु की दया की प्रतीक्षा में, और कितने चेहरे उस दिन उतरे हुए होंगे, समझ रहे होंगे कि उनपर वह टूटने वाली है जो कमर तोड़ डालेगी।
परंतु (मनुष्य को देखो), इसने न तो क़यामत के अच्छे परिणाम को सत्य माना, न नमाज़ पढ़ी, अपितु झुठला दिया और मुँह मोड़ा। फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों में चल दिया। अफ़सोस है, तुझ पर अफ़सोस है! फिर अफ़सोस है, तुझ पर अफ़सोस है!
क्या मनुष्य यह समझता है कि वह यूं ही छोड़ दिया जाएगा? क्या वह तुच्छ पानी की बूंद न था जो टपका दी जाती है? (इससे) वह एक ख़ून का लोथड़ा बना। फिर परमेश्वर ने उसे बनाया, फिर संवारा। फिर उसके जोड़े बनाए, नर और मादा। क्या उस प्रभु का अब सामर्थ्य नहीं कि मुर्दों को जीवित कर दे?