सूरह 113
अल्-फ़लक़्
मदनी · 5 आयतें · 1 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें क़ुरआन के समापन की प्रार्थना और हर दृष्टि से एक जोड़ा हैं। इसी कारण इन्हें "मुअव्वज़तैन" कहा जाता है। पहली सूरह में तर्क (इस्तिदलाल) और दूसरी में परमेश्वर की दया की याचना (इस्तिरहाम) का पहलू प्रमुख है। इनमें संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में उस समय अवतरित हुईं, जब यहूदी, क़ुरैश और मनुष्यों तथा जिन्नों में शैतानी प्रवृत्ति वाले इबलीस के वंशज, पैग़ंबर (स.) के संदेश को सफलता की ओर बढ़ते देख, उनके विरुद्ध आक्रमण की तैयारी कर रहे थे।
दोनों सूरतों का विषय यह उपदेश देना है कि पैग़ंबर (स.) अपनी और अपने मिशन की सुरक्षा के लिए इस दुनिया की समस्त आपदाओं और समस्त रचनाओं के संकटों से अपने प्रभु की शरण माँगें, क्योंकि केवल वही है जो इन सभी संकटों और आपदाओं से मनुष्यों को वास्तविक शरण दे सकता है।
यदि इस विषय पर गहराई से विचार किया जाए, तो यह क़ुरआन के प्रत्येक विद्यार्थी का ध्यान उसकी शुरुआत में सूरह अल्-फ़ातिहा की ओर ले जाता है, जहाँ बंदा परमेश्वर की एकता और अद्वितीयता (तौहीद) को स्वीकार करता और अपने प्रभु के समक्ष विनम्र होकर प्रार्थना करता है कि वह उसे सीधा मार्ग (सिरात-ए-मुस्तक़ीम) दिखाए। इस प्रार्थना के उत्तर में संपूर्ण क़ुरआन है, जो उस मार्ग की व्याख्या करता है, यहाँ तक कि वह तौहीद की सबसे संक्षिप्त और व्यापक सूरह — अल्-इख़लास — तक पहुँच जाता है। इसके बाद ये अंतिम दो सूरतें आती हैं, जिनमें बंदा पुनः परमेश्वर के गुणों का सहारा लेकर प्रार्थना करता है कि उसका प्रभु उसे तौहीद के मार्ग पर खड़े हर डकैत से सुरक्शित रखे और इस मार्ग के उतार-चढ़ाव में हर क़दम पर उसकी रक्षा करे। क़ुरआन की शुरुआत के साथ यह समापन जो संबंध रखता है, वह किसी भी विचारशील व्यक्ति से छिपा नहीं रह सकता।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
तुम प्रार्थना करो, (हे पैग़ंबर) कि मैं उस प्रभु की शरण मांगता हूं जो उत्पन्न करने वाला है, हर उस चीज़ की हानि से जो उसने पैदा की है, विशेष रूप से अंधकार की हानि से, जब वह छा जाए और गांठों पर फूंकनें वालों की हानि से और हर ईर्ष्या करने वाले की हानि से, जब वह ईर्ष्या करे।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात जो रात से सुबह को, गुठली से कोंपल, दाने से अंकुर, गर्भ से शिशु और पहाड़ों का सीना चीरकर उनसे नदियाँ और झरने प्रकट करने वाला है। ↩