सूरह 105
अल्-फ़ील्
मक्की · 5 आयतें · 2 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में हाथी (फ़ील) की घटना के संदर्भ में क़ुरैश को यह चेतावनी दी गई है कि वे परमेश्वर के प्रकोप से डरें, जबकि दूसरी सूरह में पवित्र घर (बैतुल-हराम) के माध्यम से उन्हें यह उपदेश किया गया है कि इस घर के कारण उन्हें परमेश्वर के जो अनुग्रह प्राप्त हैं, उनका सम्मान करें और परमेश्वर के मुक़ाबले में विद्रोह छोड़कर केवल उसी की उपासना करें।
दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश क़बीले के नेताओं की ओर है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) से कुछ समय पूर्व, मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में अवतरित हुई हैं।1
टिप्पणियाँ 1
- इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩
पहली सूरह — अल्-फ़ील — का विषय क़ुरैश को इस सत्य से सचेत करना है कि जिस प्रभु ने अपने शत्रुओं को तुम्हारे सामने इस प्रकार परास्त किया, यदि तुम स्वयं उसी के विरुद्ध उठे हो तो वह तुम्हें छोड़ नहीं देगा। तुम भी इसी प्रकार मिटा दिए जाओगे।
दूसरी सूरह — क़ुरैश — का विषय उन्हें यह उपदेश करना है कि जिस घर के मालिक ने उन्हें आजीविका और सुरक्षा प्रदान की है, कम से कम वे उसका यह अधिकार तो स्वीकार करें कि केवल उसी की उपासना करें और दुनिया में उसके सच्चे भक्त बनकर रहें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
तूने देखा नहीं कि तेरे प्रभु ने हाथी वालों के साथ क्या किया? उनकी चाल क्या उसने व्यर्थ नहीं कर दी? और उनपर झुंड के झुंड पक्षी थोप नहीं दिए?1
टिप्पणियाँ 1
- यह अब्रहा की सेनाओं की अंतिम बेबसी और विनाश का चित्रण है। अर्थात परमेश्वर ने पथराव करने वाली आँधी से उन्हें इस तरह रौंद डाला कि उनकी लाशें उठाने वाला भी कोई न बचा। वे मैदान में बिखरी पड़ी थीं और मांसाहारी पक्षी उन्हें नूचने और खाने के लिए उनपर झपट रहे थे। ↩
इस प्रकार कि तू पकी हुई मिट्टी के पत्थर उन्हें मार रहा था और उसने उन्हें खाने के भूसे के समान कर दिया।