सूरह 103
अल्-अस्र
मक्की · 3 आयतें · 1 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह परमेश्वर के जिस प्रतिफल (मजाज़ात) के नियम को प्रमाणित करती है, दूसरी सूरह में उसी के संदर्भ में क़ुरैश क़बीले के पूरे नेतृत्व को उसके अंजाम के बारे में सचेत किया गया है। दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश के नेताओं की ओर है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) से कुछ समय पूर्व, मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में अवतरित हुई हैं।1
टिप्पणियाँ 1
- इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩
पहली सूरह — अल्-अस्र — का विषय परमेश्वर के उस प्रतिफल के नियम को प्रमाणित करना है, जिसके अनुसार ईश्वरीय न्याय व्यवस्था क़ुरैश के लिए शीघ्र ही अपना निर्णय सुनाने वाली थी ।
दूसरी सूरह — अल्-हुमज़ह — का विषय इसी नियम के संदर्भ में उनके पूरे नेतृत्व को उसके अंजाम से सचेत करना है, जो धन-संपत्ति के घमंड में डूबा हुआ था और रसूल के मुक़ाबले में अहंकार, उपहास और दोषारोपण की प्रवृत्ति पर तुला हुआ था।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
समय साक्षी है, ये लोग घाटे में पड़ कर रहेंगे। हाँ, परंतु वे नहीं जो ईमान लाए और उन्होंने भले कर्म किए, और एक दूसरे को सत्य का उपदेश किया और सत्य पर अड़िग रहने का उपदेश किया।